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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन १७३ द्वितीय-करणत्वलक्षण-खण्डनम् कर्तृव्यापारविषयः करणमित्यपि न । शरीरचालनाय प्रयतमानस्य निष्पाद्या शरीरक्रिया, क्रियाविशिष्टं वा शरीरं प्रयत्नलक्षणकर्तृव्यापारविषयीभवतीति तस्यां क्रियायां करणं स्यात् । न चैतत् शक्याङ्गीकारम्, भविष्यतः स्वं प्रति च कार- कत्वानुपपत्तेः । न च साक्षात्कर्तृव्यापारविषय इति विशेषोपादानेऽप्यस्य परिहारः, साक्षाद्व्यापार्यमनःप्रभृतिक्रियायां प्रसङ्गतादवस्थ्यात्, अव्यापकत्वाच्च । अथ तत्क्रियाहेतुस्तत्क्रियाकर्तृव्यापारस्य विषयस्तत्क्रियाकरणमिति मन्यसे । द्वितीय करणत्व-लक्षण का खण्डन 'कर्ता के व्यापार का विषय करण है' यह लक्षण भी अयुक्त है, कारण शरीर की चलनक्रिया के लिए यत्नवाले कर्ता के यत्नरूप व्यापार का विषय चलनरूप क्रिया या क्रियाविशिष्ट शरीर होता है । अतः शरीर की चलनरूप क्रिया में चलनरूप क्रिया या क्रियाविशिष्ट शरीर करण हो जायगा । अर्थात् जैसे वृक्षच्छेदन के लिए प्रयतमान कर्ता के व्यापार का विषय होने से क्रियाविशिष्ट कुठार या उद्यमन-निपतनादि क्रियाएँ छेदनरूप क्रिया की करण हैं, वैसे ही शरीर-चलन के लिए प्रयतमान पुरुष के व्यापार का विषय होने से क्रियाविशिष्ट शरीर या शरीरक्रिया शरीर-चलनरूप क्रिया की करण हो जायगी । भेद यह है कि प्रकृत में अन्य कोई क्रिया नहीं है, अतः शरीरक्रिया ही शरीर या तत्क्रिया की करण हो जायगी । किन्तु इसे आप अङ्गीकार नहीं कर सकते, क्योंकि करण नियतपूर्ववर्ती होने से भावी पदार्थ करण नहीं हो सकता और न वह स्वयं स्व के प्रति करण होता है । खंडन —कर्ता के व्यापार का साक्षात् विषय करण है, शरीर मनोव्यापार ( सङ्कल्प ) द्वारा कर्तृव्यापार का विषय है; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—ऐसा लक्षण करने पर तो सङ्कल्पविशिष्ट मन या संकल्प भी करण हो जायगा, कारण वह कर्तृव्यापार का साक्षात् विषय है । किञ्च—कुठारादि भी शरीर-व्यापार द्वारा ही कर्तृव्यापार का विषय होता है, अतः साक्षात् निवेश करने पर कुठारादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—जो तत्क्रिया का हेतु होकर तत्क्रिया के कर्तृव्यापार का विषय हो, वह तत्क्रिया में करण है, ऐसा करण-लक्षण करेंगे । एवञ्च शरीरक्रिया शरीरक्रिया में हेतु नहीं है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अनीश्वरवाद में अङ्कुर