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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] व्यापार-लक्षण का खण्डन १८५ नित्यसङ्घटितेऽपि निर्विकल्पकं मंस्यस इति चेन्न । कारणान्तरादेव तदुपपत्तौ तत्र निर्विकल्पककल्पनायां प्रमाणाभावात् । प्रत्युत तत्सङ्घटनस्य स्वभा- वानतिरेकोपगमात् । तथापि यत्किञ्चित्जनकं तदेव तत्रानुमितिकरणमास्तामिति चेन्न । तथेन्द्रिया- देरनुमितिकरणत्वापत्तेरिति अलमतिप्रसरेणेति । शब्दश्रोत्रसन्निकर्षस्य च श्रोत्राव्यापारत्वप्रसङ्गात् । अन्यथा श्रोत्रस्य शब्द- प्रतिपत्तावकरणत्वप्रसङ्गात् । सन्निकर्षो हि इन्द्रियव्यापार उच्यत इति व्यापारा- न्तरञ्च तस्य क्षणिकमसिद्धम् , स्थिरे चोक्त एव दोषः । समर्थन—अभाव की प्रमा भी निर्विकल्पकज्ञानपूर्वक ही होती है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जब अभाव की प्रमा प्रतियोगी की स्मृति से युक्त इन्द्रिय-सन्निकर्ष से ही हो सकती है, तब उस प्रमा में निर्विकल्पक ज्ञान को कारण मानने में कोई प्रमाण नहीं है । प्रत्युत अभाव आदि नित्यसाकाङ्क्ष पदार्थों का यह स्वभाव है कि निर्विकल्पक ज्ञान के विना भी वे विशिष्टज्ञान ( सविकल्पक ज्ञान ) के विषय होते हैं । समर्थन—व्याप्ति की स्मृति ही परामर्शरूप व्यापार की जनक होने से अनुमिति का करण क्यों न मानी जाय । खण्डन—ऐसा होने पर इन्द्रिय ही अनुमिति- करण क्यों न मानी जाय ? जैसे 'वह्निव्याप्यो धूमः' इत्याकारक व्याप्तिस्मृति, 'योऽयं वह्निव्याप्यो धूमस्तद्वान् अयं पर्वत:' इस परामर्श की जनिका है, वैसे ही इन्द्रिय भी उक्त परामर्श की जनिका है। अतः व्याप्तिस्मृति के तुल्य इन्द्रिय की भी उक्त स्मृति व्यापार हो सकती है। यदि इन्द्रिय को अनुमिति का करण मान लें, तो इन्द्रियजन्य होने से अनुमिति प्रत्यक्ष हो जायगी । एवञ्च प्रत्यक्षत्व तथा अनुमितित्व का साङ्कर्य हो जायगा । इतना० ही बहुत है, विस्तार से कुछ फल साध्य नहीं । किञ्च—यदि करण का व्यापार करण से जन्य कहा जाय, तो शब्द के साक्षात्कार में श्रोत्र का शब्द-समवाय [ अजन्य होने से ] व्यापार नहीं होगा । यदि समवाय को उक्त स्थल में व्यापार न मानें, तो श्रोत्र करण न हो सकेगा । कारण, व्यापारवत् कारण को ही करण कहते हैं और श्रोत्र का शब्द से सन्निकर्ष ही व्यापार हो सकता है । जो क्षणिक जन्य हो, ऐसा अन्य व्यापार शब्द-प्रत्यक्ष में असिद्ध है और स्थिर ( समवाय ) व्यापार [ उक्त लक्षण का समन्वय न होने से ] हो नहीं सकता । २४