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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 205

१८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम अन्तरायसम्भवात् हस्ताद्यव्याप्तिः । आफलव्यापाराभिप्राये च व्यवधानास- म्भवात् कारकमात्रं करणमित्युक्तं स्यात् । व्यापारवतश्च फलाव्यभिचार इति किं तद्व्यापारस्य फलाव्यभिचारित्वम् , व्यापारविशिष्टस्य वा ? नाद्यः ; हस्ताद्यकरणत्वापातात् । अत एव न द्वितीयः ; यागादेः स्वर्गाद्यकरणत्वापातात् । अपूर्ववाक्यार्थत्ववादिनाऽपि चरमयागस्य फलकरणत्वाभ्युपगमादिति । अथोच्यते--यद्वानेव करोति तत्करणम्, यद्वानेव प्रमिमीते तत्प्रमाणम् । मैवम् ; आत्मधर्मप्रध्वंसादीनामकरणानां प्रमाणत्वप्रसङ्गात् । हो, वहाँ हस्त में अव्याप्ति हो जायगी। यदि 'फलपर्यन्त व्यापारवान् करण है' यह पक्ष मानें, तो फल का अव्यवधान होने से 'व्यवहित उत्तर' यह कथन ही युक्त नहीं है। किञ्च - कारकमात्र में फलपर्यन्त व्यापार होने से कारकमात्र में अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—'व्यापारवतः फलाव्यभिचारित्वम्' इस लक्षणवाक्य का क्या अर्थ है, क्या जिस कारण में स्थित व्यापार के अनन्तर फल हो—यह अर्थ है अथवा जिस व्यापारवत् कारण के अनन्तर फल हो—यह अर्थ है ? प्रथम अर्थ में हस्त-व्यापार के उत्तर कदाचित् अन्तराय ( विघ्न ) होने पर फल न होने से हस्त में अव्याप्ति हो जायगी। द्वितीय अर्थ में भी व्यापारवत् हस्त के अनन्तर कदाचित् अन्तरायवश फल न होने से हस्त में ही अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च--क्रियाकलापरूप याग के क्षणिक होने से अपूर्वविशिष्ट याग के अनन्तर स्वर्गरूप फल न होने से याग में भी अव्याप्ति हो जायगी। जो आचार्य लिङ् का अर्थ भावना या इष्टसाधनता नहीं मानते, किन्तु अपूर्व को ही लिङर्थ मानते हैं, वे भी 'दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत' इस स्थल में पूर्व-पूर्व अपूर्वविशिष्ट चरम याग को परमापूर्व का कारण मानते ही हैं। समर्थन—जिससे युक्त कर्ता कार्य करता है, वह करण है तथा जिससे युक्त प्रमाता प्रमिति को करता है, वह प्रमाण है। खंडन—अतीत, अनन्त सुखादि के अनन्त ध्वंसों से विशिष्ट ही प्रमाता प्रमिति को करता है। अतः आत्मा के धर्म, सुखादि के ध्वंस में भी प्रमा का करणत्व चला जायगा।