BharatKosha
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

Page 21 of 610

Read in context
Page 21

२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम 'शब्दार्थनिर्वचनखण्डनया नयन्तः सर्वत्र निर्वचनभावमथर्वगर्बान् । धीरा यथोक्तमपि कीरवदेतदुक्त्वा लोकेषु दिग्विजयकौतुकमातनुध्वम् ॥ ३ ॥ प्रमाणादि-स्वीकार का कथाङ्गत्व-खण्डन अथ कथायां वादिनो नियममेतादृशं मन्यन्ते - 'प्रमाणादयः होने पर उनके शिरोभूषण चन्द्र की किरणों से औचित्यवश सङ्कुचित हैं। अथवा अज्ञान के नाश के लिए जीवों के नत (उपासना में नम्र) होने पर उनके उपासनारूप चन्द्र की किरणों से सङ्कुचित (साकारता को प्राप्त) हैं ॥ २ ॥ हे धीरो ! आप लोग जैसा लिखा है, वैसा ही (ऊहापोह में रहित भी) इस ग्रन्थ को शुक के तुल्य कहकर पदार्थमात्र के लक्षणों के खण्डन द्वारा अतिगर्व से युक्त पण्डितों को सर्व जगह चुप करते हुए लोक में दिग्विजयस्वरूप क्रीड़ा का विस्तार करें ॥ ३ ॥ १ 'शब्दस्य अर्थः तस्य निर्वचनम्...' ऐसा समास है। विद्यासागरी और शाङ्करी में 'शब्दश्च अर्थश्च...' ऐसा लिखा है। इसमें शब्द विशेषण व्यर्थ हो जायगा, क्योंकि शब्द भी शब्द- शब्द का अर्थ ही है, - 'अर्थनिर्वचन' कहने से ही इष्ट सिद्ध हो जायगा। सच तो यह है कि 'इस शब्द का यह अर्थ है' इस बोध के द्वारा शब्दप्रयोगरूप व्यवहार की सिद्धि ही लक्षण का प्रयोजन है। इससे शब्द के अर्थ का ही लक्षण होता है। २ शास्त्रार्थ के आरम्भ से पहले वादी-प्रतिवादी दोनों मिलकर कुछ नियम मान लेते हैं, इसलिए कि शास्त्रार्थ निर्विघ्न समाप्त हो। जैसे—सत्यनिष्ठ, दोनों से अधिक विद्वान् तथा सीमा के लांघनेवाले को दण्ड देने में समर्थ मध्यस्थ होना चाहिए, वादी को अपना पक्ष प्रमाण- तर्क से सिद्ध करना चाहिए एवं प्रतिवादी को वादी के पक्ष में दोष देना चाहिए, ऐसे बहुत से नियम देश-काल के अनुसार होते हैं। नैयायिक इनसे अधिक एक और नियम सबसे मनवाना चाहते हैं कि 'प्रमाण, प्रमेय आदि सोलह पदार्थ हैं, यह वादी-प्रतिवादी दोनों को शास्त्रार्थ से पहले ही मान लेना चाहिए।' उनका आशय यह है कि यदि प्रतिवादी इस नियम को मान लेगा, तो अपने सिद्धान्त शून्यवाद आदि से गिर जायगा। यदि न मानेगा, तो शास्त्रार्थ का अनधिकारी होने से विद्वत्समाज से बहिष्कृत हो जायगा। इस ग्रन्थ में सबसे प्रथम इसी नियम का खण्डन करते हैं।