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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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२०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नेन्द्रियसंयोगमात्रं विवक्षितम्, किं नाम ? यदनन्तरं भासमानतोत्पत्तिरिति चेन्न । तदनन्तरमपि भासमानतोत्पत्तेः । भासमानतान्तरं तत्, न त्विदं भासमानत्वमिति चेन्न । अव्याप्तिप्रसङ्गात्, एकभासनमात्रव्यवस्थितत्वात् लक्षणस्य । अथ मन्यसे यद्भासनं यस्य विषयस्येन्द्रियसंयोगादुत्पन्नं तत्तत्र प्रत्यक्षं प्रमाणमिति निरुक्तौ न दोष इति । मैवम् ; यद्भासनं घटोऽयमिति यस्य विषय- स्यात्मन इन्द्रियेण सह सन्निकर्षादुत्पन्नं तद्भासनं तस्मिन्नात्मनि प्रमाणं स्यात् । नात्मा तस्य विषयः, तत्कथमेवं स्यादिति चेत् । न हि भवता तदीयविषय- स्येत्युक्तम्, किन्तु सामान्यतो विषयस्येति, तेनेदमभिहितम् । यदि तु तदीयता- विशेषणमुपादत्ते भवान्, तदा यदि तच्छब्देन ज्ञानजातीयमात्रपरामर्शस्तदा स समर्थन—'जिस इन्द्रियसंयोग के अनन्तर भासन होता हो, उस इन्द्रियसंयोग के अनन्तर जायमान जो भासन, उसका विषय आकार तथा इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा परिष्कार करेंगे, तो घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । कारण, चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मज्ञान नहीं होता । खण्डन--यद्यपि चक्षुःसंयोग के अनन्तर आत्मज्ञान नहीं होता, तथापि आत्मा का ज्ञान तो होता ही है । अतः आपके लक्षण का समन्वय होने से घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । समर्थन--आत्म-मनःसंयोग के अनन्तर आत्मा का भासन होता है, घट का भासन तो नहीं होता । अतः घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं होगा । खंडन--तत्र तो 'जिस इन्द्रियसम्प्रयोग के अनन्तर घट का भासन होता हो, उस इन्द्रिय के सम्प्रयोग से जन्य ( घट) ज्ञान प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण होने से घटज्ञान में ही लक्षण का समन्वय होगा, अन्यत्र पटादि-ज्ञान में सर्वत्र अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जो ज्ञान जिस विषय और इन्द्रिय के संयोग के अनन्तर होता है, वह ज्ञान उस विषय में प्रत्यक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च घटज्ञान आत्मा में प्रत्यक्ष नहीं है । खंडन—'घटोऽयम्' यह भासन जिस विषय आत्मा और मन के संयोग के अनन्तर उत्पन्न होता है, अतः वह 'घटोऽयम्' भासन आत्मा में प्रत्यक्ष हो जायगा । इसलिए ऐसा परिष्कार भी असङ्गत है । समर्थन—आत्मा 'घटोऽयम्' इस ज्ञान का विषय नहीं है, अतः घटज्ञान-आत्मा में प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है ? खंडन—आपने 'तद्-ज्ञान का विषय' ऐसा निवेश न कर सामान्यरूप से विषय का निवेश किया है, इसीलिए यह दोष होता है । यदि तद्-ज्ञानका