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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 253

२३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [प्रथम क्वचिदस्फुटत्वाद्विवाद इति चेत् । मैवम्; निरंशे वस्तुनि कः स्फुटत्वाव- भासः । यद्येकार्थसमवायिभिर्भूयोभिः सहोपलम्भः, स ज्ञानत्वादिवत् साक्षात्त्वेऽपि तर्हीति ज्ञानादित्वे न विवादः, साक्षात्त्वे त्विति विशेषो वाच्यः । दर्शनकृतो हि विवादो न मात्सर्येण वाङ्मात्रेण वा, किन्तु तत्त्वाभिमानादेव । प्रत्यक्षार्थधर्मिकायां चानुमायां साक्षात्त्व-परोक्षत्वसङ्करो दुर्वारः । परोक्षत्वं न जातिः, किन्तु साक्षात्त्वमेव तथा। केवलं तु साक्षात्त्वाभावः परोक्षत्वमिति चेन्न । अस्यार्थस्याऽविनिगन्तव्यत्वापत्तेः । सर्वज्ञमनुमन्यमानस्य च मते दृष्टलिङ्गादेरीश्वरस्य लिङ्ग्यादिवद्भावपरोक्षत्वेनापि विरोधः । समर्थन—वायुज्ञान में प्रत्यक्षत्व का स्फुट अवभास ( समग्र रूप से अर्थ का ग्रहण ) न होने से ही वहाँ मतभेद होता है । खण्डन—प्रत्यक्षत्व जाति निरंश ( अखण्ड ) है, अतः उसका स्फुट अवभास क्या वस्तु है ? यदि कहें कि ज्ञानरूप एक अर्थ में समवायी जो ज्ञानत्व, अनुभवत्व, अपरोक्षत्व आदि बहुत-से धर्म हैं, उनके सहित अवभास ही 'स्फुट अवभास' है, तो वह स्फुट अवभास ज्ञानत्व की तरह प्रत्यक्षत्व में भी है । फिर ज्ञानत्व आदि में तो विवाद होता नहीं और प्रत्यक्षत्व में विवाद होता है, इसमें कोई विशेष कारण कहना होगा । यह दर्शनकारों ( परीक्षकों ) का विवाद है, अतः वह ईर्ष्या या वाङ्मात्र से नहीं, किन्तु तत्त्व के अभिमान से है । अर्थात् हम जो कहते हैं, वह प्रामाणिक है, इस अभिमान से ही वह विवाद चलता है । इसलिए अपने पक्ष की सिद्धि के निमित्त अपने कथित अर्थ में आपको कोई विनिगमक बताना ही पड़ेगा । किञ्च—जहां धर्मी ( पक्ष ) प्रत्यक्ष है, उस अनुमिति में पक्षांश में प्रत्यक्षत्व तथा साध्यांश में परोक्षत्व होने से भी दोनों में साङ्कर्य है । समर्थन—परोक्षत्व जाति नहीं है, किन्तु प्रत्यक्षत्व का अभाव ही परोक्षत्व है । अतः साङ्कर्य नहीं है । खण्डन—यह कथन भी युक्त नहीं, कारण परोक्षत्व ही जाति है और उसका अभाव ही प्रत्यक्षत्व है, ऐसा न मानने में कोई विनिगमक नहीं है । किञ्च—जो आचार्य सर्वज्ञ ईश्वर को अनुमितिसिद्ध मानते हैं, उनके मत में ईश्वर को धूमज्ञान के अनन्तर जो वह्नि का ज्ञान होता है, वह ईश्वरीय ज्ञान होने से प्रत्यक्ष है तथा लिङ्गज्ञान के अनन्तर होने से परोक्ष भी है । अतः उस ज्ञान में प्रत्यक्षत्व और परोक्षत्व का साङ्कर्य हो जाने से प्रत्यक्षत्व जाति नहीं है ।