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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 257

२४० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नवम-प्रत्यक्षलक्षणा-खण्डनम् शब्दानुमानोपमानजप्रमितिव्यतिरिक्तत्वे सति प्रमितित्वं प्रत्यक्षलक्षण- मभिधाय यः कोऽपि न त्रपते, स प्रष्टव्यः—किं प्रत्येकमिदं लक्षणम्, उत मिलितम् ? नाद्यः; प्रत्येकं व्यभिचारात् । द्वितीये किं मिलितानां निषेधः, उत निषेधानां मिलितत्वम् ? नाद्यः; प्रत्येकमेव व्यभिचारात् । न हि प्रत्येकमनुमित्यादौ मिलिततद्रूपसम्भवः । नापि द्वितीयः; मिलितास्वनुमित्यादिषु निषेधमेलकसम्भवे- ऽपि प्रत्यक्षत्वानभ्युपगमात् । न बह्वाश्रयाणामुक्तनिषेधानां लक्षणत्वम्, अपि त्वेकाश्रयाणामिति चेन्न । समुदायिभेदेऽपि समुदायस्यानुमित्यादिवत् एकतोपचारबीजाविशेषाभ्युपगम इति हि वक्ष्यते । नवम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन ‘शब्दज, अनुमानज और उपमानज प्रमितियों से भिन्न जो प्रमिति हो, वह प्रत्यक्ष है’ ऐसा लक्षण कहकर जो लज्जित नहीं होते, उनसे पूछना चाहिए कि क्या इनमें प्रत्येक लक्षण है या मिलित ? इनमें प्रत्येक अर्थात् ‘शब्दजप्रमितिव्यतिरिक्तप्रमितित्वम्’ आदि तो लक्षण नहीं कह सकते, कारण शब्दजप्रमितिव्यतिरिक्त प्रमितित्व अनुमिति में अतिव्याप्त है । इसी तरह अन्यत्र भी लक्षणों की अतिव्याप्ति जाननी चाहिए । यदि मिलित लक्षण कहें, तो ‘शब्दज तथा अनुमानज तथा उपमानज प्रतीतिसमुदाय से व्यतिरिक्त प्रमितित्व’ लक्षण है या ‘शब्दज प्रमिति का जो भेद तथा अनुमानज प्रमिति का जो भेद तथा उपमानज प्रमिति का जो भेद—एतत् भेदत्रयविशिष्ट प्रमितित्व है ? इनमें प्रथम पक्ष में समुदाय का भेद प्रत्येक में होने से प्रत्येक में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि प्रत्येक अनुमिति आदि समुदायरूप नहीं है । द्वितीय कल्प में अनुमित्यादि त्रयसमुदाय में प्रत्येक अनुमिति आदि का भेदत्रय होने से अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘शब्दादि प्रतीतियों के भेदत्रय से युक्त जो एक प्रतीति है, वह प्रत्यक्ष है ।’ अनुमित्यादि त्रयसमुदाय में एकत्व नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । खंडन— यद्यपि समुदाय के एकदेश अनुमित्यादि अनेक हैं, किन्तु समुदाय एक ही है, अर्थात् प्रत्येक अनुमिति आदि में गुणरूप एकत्व न होने पर भी जैसे औपचारिक एकत्व-व्यवहार होता है, वैसे ही अनुमित्यादि समुदाय में भी उपचार से एकत्व-व्यवहार हो सकता है । कारण उपचार का बीज परोक्षत्वरूप एक धर्म अनुमित्यादित्रय में भी विद्यमान है ।

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