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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम · उक्तश्चायमर्थो यन्माध्यमिकादिवाग्व्यवहाराणां स्वरूपापलापो न शक्यत इति । अथ मन्यसे कथकवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात् प्रमाणादीनां सत्त्वम्, सत्त्वाच्चाभ्युपगमः, यत्सत् तदभ्युपगम्यते इति स्थितेरिति । मैवम्; कयापि नियमस्थित्या प्रवृत्तायां कथायां कथकवाग्व्यवहारं प्रति हेतुत्वात् प्रमाणादीनां सत्त्वं सत्त्वाच्चाभ्युपगमो भवता प्रसाध्यः । कथातः पूर्वं तत्त्वावधारणं वा परपराजयं वाऽभिलषद्भ्यां कथकाभ्यां यावता विनाऽभिलषितं न पर्यवस्यति, तावदनुगोढव्यम् । तच्च १व्यवहारनियमसमयबन्धादेव द्वाभ्यामपि ताभ्यां सम्भाव्यते इति व्यवहारनियमसमयमेव बध्नीतः । प्रमाणादि को न मानने पर निवृत्त हो जाती। परन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि ऐसा मानें तो कारण के न होने से प्रमाणादि को न माननेवालों के वाग्व्यवहार के स्वरूप की ही निष्पत्ति, न होगी। यह बात तो हमने कह ही दी है कि माध्यमिकादि के वाग्व्यवहार के स्वरूप का अपलाप नहीं किया जा सकता। समर्थन —वाग्व्यवहार के हेतु होने से प्रमाणादि सत्य हैं और सत्य होने से स्वीकार के योग्य हैं, क्योंकि जो सत्य होते हैं वे माने जाते हैं, ऐसी लोक की स्थिति है। खण्डन—इस युक्ति से भी प्रमाणादि-स्वीकार सिद्ध हुआ, प्रस्तुत (प्रमाणादि- स्वीकार का शास्त्रार्थ-हेतुत्व) सिद्ध नहीं हुआ। किञ्च, आप किसी नियम से प्रवृत्त कथा में वाग्व्यवहारके कारण होने से प्रमाणादि के सत्यत्व को और सत्यत्व होने से प्रमाणादि के स्वीकार को साधेंगे। यदि ऐसा है तो जिस कथा में प्रमाणादि की सत्ता को सिद्ध करेंगे, उसीमें व्यभिचार होने से अथवा उसीके तुल्य अन्य कथा के भी निर्वाह होने से प्रमाणादि-स्वीकार कथा का हेतु सिद्ध नहीं हुआ। कथा के आरम्भ से पूर्व जितने के बिना तत्त्व-निश्चय या वादि-पराजयस्वरूप अभिलषित फल की सिद्धि न हो, उतना ही दोनों को मानना चाहिए। अभिलषित फल की सिद्धि (व्यवहार-नियम से समयबन्ध=प्रतिज्ञारूप बन्धन से ही) कथाप्रवृत्ति से हो सकती है। इससे दोनों व्यवहार-नियम से प्रतिज्ञारूप बन्धन को स्वीकार करते हैं। १ व्यवहारः = वाग्व्यवहारः शास्त्रार्थं इति यावत्, तस्य प्रयोजका नियमाः प्रमाणैर्व्यवहर्त- व्यमित्यादिरूपाः, तैः समयस्य = प्रतिज्ञायाः, 'इमान् नियमान् पालयिष्यामः' इत्यादिरूपायाः, बन्धनम् = करणम् ।