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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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२७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम उपाधिः साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकः । अयञ्च— ‘एकसाध्याविनाभावे मिथः सम्बन्धशून्ययोः । साध्याभावाविनाभावी स उपाधिर्यदत्ययः ॥ इत्यस्य व्यतिरेकमुखस्य यदत्ययः, स उपाधिरिति योज्यमानस्य पर्यवसि- तोऽर्थः । तद्धर्मभूता हि व्याप्तिर्जपाकुसुमरक्ततेव स्फटिके साधनाभिमते चकास्तीति उपाधिरसावुच्यते ।’ तदिदमाहुः— ‘व्याप्तेश्च दृश्यमानायाः कश्चिद्धर्मः प्रयोजकः । अस्मिन्सत्यमुना भाव्यमिति यत्सा निरूप्यते ॥ अन्ये परप्रयुक्तानां व्याप्तीनामुपजीवकाः । तैर्दृष्टैरपि नैवेष्टा व्यापकांशावधारणा ॥’ स चोपाधिनिश्चित इवाऽऽशङ्कितश्च, यत्रेदमुच्यते— ‘यावद्व्याव्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्क्यते । विपक्षस्य कुतस्तावद्धे तोर्गमनिकाबलम् ॥’ लोहलेख्यत्व का पार्थिवत्व में एकार्थसमवायरूप सम्बन्ध भी व्याप्ति हो जायगा, कारण समवाय सम्बन्धी का स्वरूप है । समर्थन—‘जो साध्य का व्यापक तथा साधन का अव्यापक हो, वह उपाधि है’— ऐसा लक्षण करेंगे । यह उदयनाचार्य के व्यतिरेकमुख से कथित लक्षण-वाक्य का फलितार्थ है । आचार्य के लक्षण-वाक्य का अक्षरार्थ तो यह है कि ‘साधन और उपाधित्व से अभिमत—दोनों के मध्य जिसका अभाव साध्याभाव का व्याप्य हो, वह उपाधि है । वह्नि से धूम के अनुमितिस्थल में आर्द्रेन्धनसंयोग की उपाधि संज्ञा है । जैसे स्फटिक में जपाकुसुम के रक्तत्व के भान के निमित्त जपाकुसुम को उपाधि कहते हैं, वैसे ही आर्द्रेन्धनसंयोगनिष्ठ धूम की व्याप्ति के वह्नि में भान के निमित्त आर्द्रेन्धनसंयोग को भी उपाधि कहते हैं । कहा भी है कि अन्य ( सोपाधिक ) हेतु उपाधिनिष्ठ व्याप्ति का अवलम्बन करते हैं, वे सोपाधिक हेतु पक्ष में देखे भी जायँ, तो भी व्यापक की सिद्धि नहीं होती । वह उपाधि निश्चित के तुल्य आशङ्कित भी होती है । यह भी कहा है कि ‘जब तक विपक्ष में हेतु के शतांश से भी अर्थात् उपाधि की शङ्का से भी शङ्का हो, तब तक हेतु में साध्यगमन की सामर्थ्य कैसे हो सकती है ?