खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
Page 301 of 610
Read in context२८४ सानुवादे खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम
सिषाधयिषितधर्मा धर्मीति चेन्न । सिषाधयिषा हि प्रतिपिपादयिषा वा स्यात् प्रतिपित्सा वा ? आद्ये स्वार्थानुमित्यनुदयप्रसङ्गः । द्वितीये चासुरभिगन्धानुमेय- कुत्सितरसविषयस्वार्थानुमित्यनुदयप्रसङ्गः । न चानवधारितधर्मा धर्मी पक्षः । हेतुमत्तयाऽप्यनवधारणे अनुमानोदय- निदानभावासम्भवात् । अवधारणे चानवधारितधर्मत्वानुपपत्तेः । न चाऽनवधारितहेतुविषयधर्मा धर्मी पक्षः । तथाहि—केन अनवधारितधर्मा ? न तावदनुमानप्रयोक्त्रा, स्वयमज्ञाते परं प्रत्यप्रयोगात् । प्रतिवादिनेति चेन्न । प्रतिवादिविदिते ऽप्यर्थे वादितया परस्परविद्योत्कर्षापकर्षनिरूपणार्थमनुमानदर्शनात् । निर्वचन—जिस धर्मी में साध्यरूप धर्म की सिषाधयिषा हो, वह पक्ष है। खंडन— ‘सिषाधयिषा’ कथन की इच्छा है या ज्ञान की इच्छा ? यदि प्रथम पक्ष मानें, तो स्वार्था- नुमिति ही नहीं होगी । कारण स्वार्थानुमिति में पञ्चावयवात्मक प्रतिपादन की इच्छारूप पक्षता नहीं रहती और अनुमितिमात्र में पक्षधर्मता कारण है । द्वितीय पक्ष में ‘सटित- मांसं ( सड़ा मांस ) कुत्सितरसवत्, असुरभिगन्धवत्त्वात्’ यह स्वार्थानुमान नहीं कहलायेगा । कारण यहाँ प्रतिपित्सारूप पक्षता नहीं है । निर्वचन—जिस धर्मी का धर्म ज्ञात न हो, वह धर्मी पक्ष है । ‘पर्वतो वह्निमान् धूमात्’ इत्यादि स्थल में पर्वतरूप धर्मी का धर्म साध्यरूप वह्नि अज्ञात है । अतः पर्वत पक्ष हुआ । खण्डन—साध्य की तरह हेतु भी पक्ष-धर्म है । एवञ्च एतादृश पक्षता रहने पर अर्थात् हेतुमत्तया पक्ष का अवधारण न होने पर हेतुमत्तावगाहि परामर्श नहीं हो सकता, जो कि अनुमिति की उत्पत्ति का निदान या कारण है। यदि हेतुमत्तया अवधारण हो, तो उक्त परामर्श हो सकने पर भी उक्त पक्षता नहीं बनती । उभयथा अनुमिति न हो सकने से उक्त लक्षण असम्भवग्रस्त हो जायगा । समर्थन—‘हेतु का विषय ( व्यापक ) साध्यरूप धर्म जिस धर्मी में, अज्ञात हो वह पक्ष है’ ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च उपर्युक्त कोई दोष नहीं होगा । खंडन—यह लक्षण भी युक्त नहीं; कारण किससे अज्ञात कहेंगे ? यदि न्यायप्रयोक्ता द्वारा अज्ञात कहें, तो परार्थानुमान में अनुमानप्रयोक्ता द्वारा पर्वत में वह्नि ज्ञात ही होने से वह पक्ष न कहलायेगा । स्वयं बिना जाने दूसरे के लिए प्रयोग ही नहीं हो सकता । यदि प्रतिवादी द्वारा अज्ञात कहें, तो भी युक्त नहीं । कारण प्रतिवादी द्वारा साध्य के ज्ञात होने पर भी परस्पर विद्योत्कर्ष के बाधनार्थ प्रतिवादी अनुमान का प्रयोग करते ही हैं ।