BharatKosha
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

Page 310 of 610

Read in context
Page 310

'संज्ञेत्यप्याकुलम् ; 'गोसदृशो गवयः प्रायः कानने महति दृश्यते' इति श्रुत- वाक्यस्य काननपदाविदितसङ्गतर्गवयपदविदितसङ्गतेश्च असंज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रति- पत्तिफलायामीदृशप्रतिपत्तौ गतत्वेनातिव्यापकत्वात् । विनाऽपि वा प्रायः शब्दमभिहितस्य तस्यानुसन्धाने प्रसङ्गः । तत्र काननसंज्ञासंज्ञिसम्बन्धावधारणेऽपि अन्यत्रैव पदान्तरसमभिव्याहारोत्थाया अन्यथानुपपत्तेः प्रमाणत्वात् , न तु उपमानस्य । उपमेयसंज्ञासमभिव्याहृतेति विशेषणे च पूर्वोक्त एव निरासः । वाक्यार्थे-यपि तादृगेव; प्रतिपत्तिकालस्मृतातिदेशवाक्यावगत-काननादिपदा- र्थ-य तथाविधप्रत्ययाव्यापनात् । वाक्यैकदेशस्यापि वाक्यत्वेन विवक्षितत्वे 'सदृशो गवयः' इत्यादिस्मारिणोऽपि प्रत्यये प्रसङ्गात् । किञ्च—लक्षण में शब्दपद का निवेश भी सदोष ही है। देखिये—जिस पुरुष ने 'गोसदृशो गवयः प्रायो महति कानने दृश्यते' इस वाक्य का श्रवण तो किया, पर कानन पद का संकेत नहीं जाना और गवय पद का संकेत जानता है, उस पुरुष के अनुमानरूप [ यही कानन है, गवयाधार होने से' इत्याकारक ] अनुसन्धान में अतिव्याप्ति हो जायगी; क्योंकि उसके भी कानन पद का फल संकेतज्ञान ही है। जहाँ 'प्रायः' पद नहीं है, ऐसे उक्त वाक्य के अनुसन्धान में भी अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण यहाँ भी कानन पद के संज्ञा-संज्ञिसम्बन्ध के अवधारण में 'इह हि प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबति' इस वाक्यगत मधुकर पद के समान पदान्तरसमभिव्याहार से उत्थित अन्यथानुपपत्ति ही प्रमाण है, उपमान प्रमाण नहीं । अर्थात् 'यदि यह कानन पद का अर्थ न हो, तो कानन पद में गवय पद का सन्निधान अनुपपन्न हो जायगा' इत्याकारक अनुपपत्ति से ही कानन पद का संकेत ग्रह होगा । 'अनवगतसङ्गति-उपमेयसंज्ञा से समभिव्याहृत' आदि निवेश करें, तो उसका भी पूर्वोक्त निरास है, अर्थात् उपमिति की निरुक्ति से पूर्व वह नहीं हो सकता । किञ्च—लक्षण में वाक्यार्थ का निवेश भी सदोष ही है। सुनिये—जहाँ पहले 'गोसदृशो गवयः प्रायो महति कानने दृश्यते' वह वाक्य तो श्रुत हो, किन्तु अदृष्टवश वाक्यघटित कानन पद का अर्थ स्मृत न हुआ हो, उस स्थल में वाक्यार्थ का अनुसन्धान नहीं है। किन्तु वाक्य के एकदेशार्थ का अनुसन्धान है, अतः अव्याप्ति हो जायगी । यदि वाक्य के एकदेश को भी वाक्य मान लें, तो 'सदृशो गवयः' एतावन्मात्र के अर्थ का अनुसन्धान भी उपमान हो जायगा ।

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक) · Page 310 of 610 · BharatKosha