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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 325

३०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम

विषयस्य च प्रमाणस्य च विषययोस्तद्विपरीतत्वविशेषणप्रतीत्यङ्गीकारलब्धायां परस्परविरुद्धत्वप्रतीतौ धर्मिणोर्विरुद्धधर्माध्यासस्य भेदस्य विरोधविवेचनस्फुटतद्गर्भ- प्रवेशतया तत्सहज्ञेयस्य तन्नान्तरीयकस्य वाऽन्यत्रेवाऽन्यत एव प्राप्तेः । किञ्च—अविशेषप्रवृत्तस्यैव तस्य किं विशेषविषयत्वम्, अथ सामान्यतः प्रवृत्तस्य नान्तरीयकत्या प्रागेव विशेषविषयस्य विशेषविषयत्वेनाज्ञातस्य विशेष- विषयत्वम् , अथवा सामान्यस्य तद्विषयस्य विशेषः, उत तद्विषयीकृतविशेषगतं किमपि धर्मान्तरमिदानीं प्रमीयते ? नाद्यः ; अर्थापत्तेर्भ्रमकरणत्वापत्तेः । न द्वितीयः ; तदनुव्यवसायोत्पत्ते- स्तद्विषयप्रतीत्यसम्भवात् । न तृतीयः ; सामान्यस्यानन्तर्भाविताश्रयस्य प्रत्येतुम- शक्यत्वात् प्रागेव तत्सिद्धेः । है और विरोधपदार्थ सत्त्व-असत्त्व का एक धर्मी में असमावेश ही है । अतः विरोध- ज्ञान के साथ ही धर्मिभेद ज्ञात हो ही जाता है। यदि भेद को अन्योन्याभावरूप मानें, तो 'सत्त्वासत्त्वे भिन्नधर्मिके विरुद्धत्वात्' इस अनुमान से ही धर्मिभेद सिद्ध हो जायगा। यद्यपि सत्त्वासत्त्व से धर्मिभेदमात्र की ही सिद्धि होती है, सत्त्व के बहि- धर्मिकत्व की सिद्धि नहीं हो सकती; फिर भी जब असत्त्व गृहधर्मिक प्रमित हो जाता है, तब सत्त्व का धर्मिभेद बहिर्धर्मिक ही पर्यवसित होता है। एवञ्च फिर स्वतन्त्र अर्थापत्ति प्रमाण मानने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती । किञ्च—सामान्यतः प्रवृत्त प्रमाण में ही विशेषविषयकत्व पश्चात् ज्ञात होता है, या सामान्यतः प्रवृत्त प्रमाण ही नान्तरीयक होने से प्रथम से ही विशेषविषयक है, किन्तु वह विशेषविषयकत्व अज्ञात है, जो इदानीं ज्ञात होता है अथवा सामान्यविषयक ज्ञान ही विनिगमक न होने से गृहसत्त्व और बहिःसत्त्व उभयविषयक है, 'गृहे नास्ति' इस अन्यथानुपपत्ति से उसका इदानीं बहिःसत्त्व में पर्यवसान ज्ञात होता है किंवा सामान्य- ज्ञान के विषय-विशेष में कोई अन्य धर्म इदानीं प्रतीत होता है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं है, कारण सामान्यविषयक ज्ञान में विशेषविषयत्व का विषय करनेवाला ज्ञान भ्रम हुआ । अतः उसका करण अर्थापत्ति अप्रमाण हो जायगी । द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं, कारण सामान्यविषयक ज्ञान नान्तरीयक होने से विशेष- विषयक भी है। अतः अनुव्यवसाय से ही विशेषविषयत्व का ज्ञान हो जाने से तदर्थ अर्थापत्ति का स्वीकार व्यर्थ ही है। तृतीय कल्प भी युक्त नहीं, कारण यदि सामान्यज्ञान नान्तरीयक होने से विशेषद्वयविषयक मानें, तो भी अभिमत बहिःसत्त्वविषयकत्व पूर्व से ही सिद्ध है। अतः तद्ज्ञापक अर्थापत्ति अनुवादक ही हुई, स्वतन्त्र प्रमाण नहीं ।