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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] असिद्ध-लक्षण का खण्डन ३१७ इच्छाभावस्य तस्य यथादर्शनं प्रत्यक्षादेरेवाधिगमः । इच्छैव तु तत्र यन्नास्ति तत्र सिद्धत्वं प्रयोजकमित्येतावन्मात्रेण सिद्धत्वमुपन्यस्यते सिद्धसाधने, न त्विच्छाभाव- मनुमातुं लिङ्गतयेति । एवं स्वरूपासिद्धिरपि पक्षधर्मताविरहरूपैव । ये तु व्याप्तिपक्षधर्मताविरहलिङ्गभूतास्तेऽसिद्धतः पृथगेव हेत्वाभासाः । तद्यथा—विरुद्धः साध्यविपरीतव्याप्तः । तत्र साध्यव्यतिरेकव्याप्तता हेतोर्न साध्यव्याप्तताभावः । किन्नाम ? साध्यव्यतिरेकेण सहानौपाधिकः सम्बन्धोऽन्य एवासौ । इत्थमेव पक्षधर्मताविरहात्माऽपि नायम् । किन्नाम ? ततः साध्यव्यति- रेकेण सह निरुपाधिसम्बन्धत्वात् तत्र साध्यव्याप्तिरस्य नास्तीत्यनुमीयते । तथा सति च साध्यव्याप्तिव्यतिरेकलिङ्गं सद्विरुद्धः पृथगेव हेत्वाभासो भवति । एवमनैकान्तिकोऽपि न व्याप्तिव्यतिरेकरूपः, किन्तु तल्लिङ्गमेव । तथाहि— हेतोरन्वयस्य व्यतिरेकस्य वा व्यभिचारो न साध्यसाधनव्याप्तिविरहात्मा । किं नाम ? व्यभिचारो हेतोः साध्यव्याप्तिविरहं विना न सम्भवतीति लिङ्गभावेन मत में अनुपलब्धि से ही होता है। वहाँ जो इच्छा नहीं होती, उसमें सिद्धत्व प्रयोजक है, इसीलिए सिद्धत्व का सिद्धसाधन में कथन है, इच्छाभाव के अनुमान में लिङ्गरूप से नहीं । इसी प्रकार 'शब्दोऽनित्यः चाक्षुषत्वात्' यहाँ स्वरूपासिद्धि भी पक्षवृत्तित्वरूप पक्षधर्मता का अभावरूप ही है । प्रश्न—तब तो व्याप्ति और पक्षधर्मतादि के अभाव के हेतु हेत्वाभास भी असिद्ध में ही अन्तर्भूत हो जायेंगे, क्योंकि दोनों के आभासत्व में कोई विशेष ही नहीं है ? उत्तर—जो दोष व्याप्ति और पक्षधर्मता के अभाव के हेतु हैं, वे असिद्ध से पृथक् ही हेत्वाभास हैं । देखिये, साध्याभाव से व्याप्त विरुद्ध है । हेतु में साध्याभावव्याप्तता साध्यव्याप्तत्वाभावरूप नहीं, किन्तु उससे अन्य साध्याभाव के साथ अनौपाधिक सम्बन्ध- रूप है। इसी प्रकार विरुद्ध भी पक्षधर्मता का विरहरूप नहीं है; किन्तु यतः साध्याभाव के साथ निरुपाधिक सम्बन्ध होने से 'साध्य की व्याप्ति इस हेतु में नहीं है' ऐसी अनुमिति होती है, अतः विरुद्ध भी साध्य की व्याप्ति के अभाव में हेतु होने से पृथक् ही हेत्वाभास है । इसी प्रकार अनैकान्तिक भी व्याप्ति का अभावरूप नहीं, किन्तु व्याप्त्यभाव का लिंगरूप है । देखिये—हेतु के अन्वय या व्यतिरेक का व्यभिचार साध्य-साधनव्याप्ति- विरहरूप नहीं है । किन्तु हेतु में साध्य की व्याप्ति के विरह के बिना व्यभिचार हो ही नहीं सकता, अतः वह हेतुरूप से व्याप्तिभङ्ग का बोधन करता है । यदि हेतु