खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context३२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम इत्युक्ते 'अस्मात् ह्रस्वः सः' इत्यर्थाद्गम्यते, न तु तत्र प्रतिपाद्यान्तरापेक्षा, तथे- हापि 'निरग्नौ धूमोऽस्ती'ति प्रतिपादिते 'अग्निनाऽसौ न व्याप्तः' इत्यर्थाद् गम्यते । न हि सम्भवति 'अग्निना च व्याप्तोऽनग्नौ चास्ती'ति । अत एवऽऽनन्त्यात् अतीन्द्रियोपाध्यादिलिङ्गानां येषां पूर्वमनभिधानं समर्थितम् , तेषामनभिधानेऽयमपि हेतुः—तानि ह्युपाधिलिङ्गानि नार्थवशादु- पाधिमनपेक्षाणि गमयन्ति, येन तेषां व्याप्तिर्नावधारिता तं प्रति तत्प्रतिपादन- मन्तरेणा अप्रतिपादकत्वस्यापि सम्भवात् । अनैकान्तिकत्वाद्यवगतौ च व्याप्यादिविरहबोधाय न प्रतिपादनीयान्तरापेक्षा कस्यचित्सचेतसः सम्भवतीति पूर्वपक्षसङ्क्षेपः । एवमसिद्धलक्षणे व्यवस्थिते बाधोऽयमभिधीयते । एतेन कीदृशमसिद्धलक्षणं व्यवस्थापितमायुष्मता¹ भवति ? व्याप्तत्वपक्षधर्मत्वाभ्यामप्रमितोऽसिद्ध इति तावत् अर्थाद्गम्य होता है, कारण व्याप्ति-विरह के बिना अनैकान्तिकत्व अनुपपन्न है । जैसे 'उससे यह दीर्घ है' यह कहने पर 'इससे वह ह्रस्व है' यह अर्थाद्गम्य होता है, अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही 'अग्नि के अनधिकरण में धूम है' ऐसा कहने पर 'धूम अग्नि से व्याप्त नहीं है' यह अर्थाद्गम्य होता है । कारण यह सम्भव नहीं कि धूम अग्नि से व्याप्त हो और अग्नि के अनधिकरण में रहता हो । 'अतीन्द्रिय उपाधियों के लिङ्गों के अनन्त होने से उनका हेतुदोष के रूप में अभिधान नहीं है' यह जो पीछे कह आये , वहाँ उनके अनभिधान में यह भी हेतु जानना चाहिए कि उपाधियों के वे लिङ्ग अन्य प्रतिपाद्य की अपेक्षा न करके उपाधि के अर्थवशात् बोधक नहीं है । कारण जिस पुरुष ने उपाधि की उपाधि-लिंग में व्याप्ति न जानी हो, सम्भव हैं वह व्याप्ति के प्रतिपादन के बिना उपाधि की अनुमिति न कर सके । किन्तु किसी सचेता को अनैकान्तिकत्व आदि का ज्ञान होने पर व्याप्यादि- विरह-बोधन के लिए अन्य प्रतिपाद्य ( व्याप्तिविरह की अनैकान्तिकत्व में व्याप्ति ) की अपेक्षा नहीं होती, यह पूर्वपक्ष का संक्षेप है । खण्डन—इस तरह असिद्ध का लक्षण व्यवस्थित होने पर यह दोष होता है कि आयुष्मान् ( आप ) ने इस पूर्वपक्ष में उक्त कथन से असिद्ध का कौन-सा लक्षण स्थिर किया ? 'व्याप्ति-पक्षधर्मता से अप्रमित असिद्ध है' यह लक्षण विरुद्धादि-साधारण है या नहीं, १. 'आयुष्मता' यहां निन्दा अर्थ में मतुप् प्रत्यय है ।