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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३५३ निर्णेतुं शक्यः, अन्यतरस्मिन् व्याप्यादिभङ्गेनापि सत्प्रतिपक्षत्वस्योपपत्तेः । अतो विशेषनिष्ठतया तदुन्नयने स्थिते यदि साक्षादसौ अवधार्यते तदानीमसिद्धिः । अथ लिङ्गतोऽनुमीयते, तदाऽनैकान्तिकादेरन्यतमं दूषणं वस्तुगत्याऽस्ति सत्प्रतिपक्षे । तत्कथमसिद्ध्याद्यन्यतमं नाभ्युपेयं तत्र । तस्मात्तस्य तस्य दोषस्य कुत्र द्वयो- र्मध्येऽस्तित्वमस्तीत्यन्यतरानिर्धारणे प्रतिहेतावपि तच्छङ्कायां सत्यामसिद्ध्यादि- हीनेनेति लक्षणांशस्य दुरवधारगत्वं दुष्परिहरमेव । स्यादेतत्—अस्तु लक्षणांशस्यासिद्ध्यादिहीनत्वस्यानिश्चयः । संशयोऽपि तावदस्ति । तत्संशयेन शङ्कितसत्प्रतिपक्षतादोषग्रस्तत्वादेवासाधकत्वं दूष्यानुमानस्य शङ्कितोपाधाविव असिद्धिशङ्कया । न च यामसिद्धादिशङ्कामुपजीव्य सत्प्रतिपक्षादिशङ्कादोषः स्यात्, सैव तदा दोष इति वाच्यम्; असिद्ध्यादिशङ्काया एव तादृशप्रतिहेतुदर्शनमूलकतया तदुपजीवकत्वादिति । मैवम्; यतः शङ्कितोपाधिनाऽसिद्धेनाप्येवं सत्प्रतिपक्षता प्रसज्येत । में भी व्याप्ति-पक्षधर्मता के अभाव के ज्ञान से सत्प्रतिपक्षत्व की उपपत्ति हो जाती है। एवञ्च एक में दोष का उन्नयन स्थिर होने पर यदि साक्षात् दोष अध्यवसित हो, तो असिद्धि और यदि हेतु से अनुमित हो, तो अनैकान्तिक आदि दोष वस्तुतः सत्प्रतिपक्ष में हैं । फिर वहाँ असिद्ध्याद्यन्यतम क्यों न माने जायें । तस्मात् वह दोष दोनों के मध्य कहाँ है, इसका निश्चय न होने से प्रतिहेतु में भी दोष की शङ्का होगी और इसीलिए 'असिद्ध्यादिहीनेन' इस लक्षणांश की दुरवधार्यता अपरिहार्य ही हो जायगी । समर्थन—भले ही 'असिद्ध्यादिहीन' इस लक्षणांश का निश्चय न रहे, उससे हानि क्या है ? असिद्ध्यादि की शंका ( सन्देह ) तो है ही, उसीसे शङ्कित ( सन्दिग्ध ) सत्प्रतिपक्षत्वरूप दोष से ग्रस्त होने से ही दूष्य अनुमान असाधक हो जायगा, जैसे कि व्याप्यत्वासिद्धि की शङ्का से शङ्कित उपाधि दूषक होती है । यदि कहें कि 'जिस असिद्धि की शङ्का से सत्प्रतिपक्षत्व की शङ्का होती है, उस असिद्धि के सन्देह को ही दोष मानिये, सत्प्रतिपक्ष को दोषान्तर क्यों मानते हैं', तो वह ठीक नहीं । कारण असिद्धि की शङ्का प्रतिहेतु के दर्शन से ही होती है । अतः उपजीव्य होने से सत्प्रतिपक्ष में ही दोषत्व मानना ठीक होगा । खण्डन—जहाँ उपाधि की शङ्का से असिद्धि की शङ्का होती है, वहाँ भी शङ्कित सत्प्रतिपक्ष हो जायगा । ४५