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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 388

३७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य व्यतिरेकः स कालात्ययापदिष्ट इति चेन्न । प्रत्यक्षाभासव्यापनात् । तत्रापि हि साध्यस्य ज्ञाप्यरूपस्य व्यतिरेको बोध्यत एव प्रमाणेन । प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य व्यापकस्य व्यतिरेकः, स कालात्यया- पदिष्ट इति चेन्न । प्रमाणेन बोध्यमानाभावस्य प्रकृतहेतुव्यापकत्वासम्भवात् । प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य प्रतिज्ञातस्याभावः स कालात्ययापदिष्ट इति चेन्न । स्वार्थानुमाने कालात्ययापदिष्टस्यैवमव्यापनात् । तत्र शब्दरूपस्य प्रतिज्ञातस्याभावात्, शब्दस्य परार्थत्वात् । प्रमाणेन बोध्यमानो यदीयसाध्यस्य पक्षनिविष्टस्य व्यतिरेकः, स कालात्यया- पदिष्ट इति चेन्न । तथाभूतस्य पक्षाभासत्वाभ्युपगमेन मुख्यपक्षार्थत्वासम्भवात् । पक्षाभासनिविष्टत्वे सतीति तु क्रियमाणे पूर्वं पक्षाभासत्वप्रतीत्यप्रतीतिपक्षयोः पृथक् हेत्वाभासत्वप्रतीत्यप्रतीतिपक्षोक्तदोषवद्दोषो द्रष्टव्यः । समर्थन—'प्रमाण से जिसके साध्य का अभाव बोध्यमान है, वह कालात्ययापदिष्ट है।' खण्डन—जहाँ 'नेदं रजतम्' इस प्रत्यक्ष से प्रत्यक्षाभास का बाध होता है, वहाँ (प्रत्यक्षाभास में) अतिव्याप्ति हो जायगी, कारण 'इदं रजतम्' इससे ज्ञाप्य होने से रजत भी साध्य ही है । समर्थन—'प्रमाण से बोध्यमान है व्यापक साध्य का व्यतिरेक जिसका, वह कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—प्रमाण से जिस साध्य का अभाव बोध्यमान है, वह साध्य हेतु का व्यापक नहीं हो सकता । समर्थन—'प्रमाण से जिसके प्रतिज्ञात साध्य का अभाव बोध्यमान है, वह कालात्यादिष्ट है।' खण्डन—स्वार्थानुमान में अव्याप्ति हो जायगी, कारण शब्दप्रयोग दूसरे के लिए होता है, अतः यहाँ शब्दरूप प्रतिज्ञा नहीं होती । समर्थन—'प्रमाण से जिसके पक्षनिविष्ट साध्य का व्यतिरेक बोध्यमान है, वह कालात्ययापदिष्ट है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—बाधस्थल में मुख्य पक्ष का अभाव होने से 'पक्ष' से पक्षाभास का ही ग्रहण करना होगा । एवञ्च पक्षाभास-निविष्ट साध्य का ग्रहण करने पर 'लक्षण से पूर्व पक्षाभासत्व की प्रतीति है या नहीं?' ऐसा विकल्पकर, हेत्वाभासघटित लक्षण में 'लक्षण से पूर्व हेत्वाभासत्व की प्रतीति है या नहीं?' इस विकल्प के तुल्य दोष जानना चाहिए ।