खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context४६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नियामकमिति प्रयोजकमनुगतं शक्यनिर्वचनम्, तथात्वे वा तदेव विषयत्वमस्तु । व्यवहारश्च यदि कराकर्षणादिः, स न सार्वत्रिकः नान्तरीयकश्वान्यत्रापि इत्यतिव्यापकम् । यदि इच्छादिः, तदाधारत्वमात्मन इति घटाद्यव्याप्तिः । तद्विष- यत्वं च तद्विषयत्वमेवापेक्षते । यश्चोपेक्षां नाम व्यवहारं नानुमनुते, कथं नोपेक्षाप्रेक्षामुपेक्षते । हानादि- व्यवहारज्ञानानामेव च कथं न निर्विषयत्वं प्रसज्यते । अथ सर्वत्र हानादि- व्यवहारोपगमः, तदा व्यवहारज्ञानयोरनुपरम एव स्यात् । हो जायगी । कारण उक्त स्थल में उत्पन्न विषय के वर्तमान न होने से बिना आधार के ज्ञातता कहाँ उत्पन्न होगी । किञ्च—घट-ज्ञानसे घट में ही ज्ञातता होती है, पट में नहीं, इसमें अनुगत प्रयोजक का निर्वचन संभव नहीं है। यदि कोई अनुगत प्रयोजक हो भी, तो उसीको विषयत्व मान लीजिये, उससे पृथक् ज्ञातता मानना व्यर्थ है । द्वितीय पक्ष में व्यवहार को हस्त आदि से आनयनादि रूप मानें, तो वह सर्वत्र गुणादि या व्यापक आत्मादि में नहीं है, उसमें विषयत्व के लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—मणि-आनयनरूप व्यवहार उसकी प्रभा में भी है और केवल मणिविषयक ज्ञान की विषय प्रभा है नहीं, अतः प्रभा में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । व्यवहार से यदि इच्छा का ग्रहण करें, तो उसका आधार आत्मा है, घटादि नहीं। अतः घटादि में अव्याप्ति हो जायगी । यदि ज्ञानजन्य जो इच्छा, तद्विषयत्व को व्यवहार कहें, तो विषयत्व-लक्षण विषयत्व से घटित होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च—इच्छाविषयत्व भी ज्ञान-विषयत्व की अपेक्षा करता है। अतः जबतक ज्ञानविषयत्व का ज्ञान न हो, तबतक इच्छा-विषयत्व का ज्ञान भी असंभव है। किञ्च—जो उपेक्षा (औदासीन्य) को व्यवहार नहीं मानते, उनके मत में ‘ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' इस ज्ञान के विषय तृणस्पर्श में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि हान-उपादानरूप ज्ञान-फल के आधारत्व को ही विषयत्व कहें, तो हान-उपादान के ज्ञान का हान-उपादान विषय नहीं हो सकेगा । कारण जैसे घटादिज्ञान से ज्ञान-उपादान विषय नहीं हो सकेगा। कारण जैसे घटादिज्ञान से ज्ञान उपादान होता है, वैसे ही हान-उपादानज्ञान से हान-उपादान नहीं होता । यदि हानादि-ज्ञान से हानादि- व्यवहार मान लें, तो उस हानादि-व्यवहार से भी हानादि-व्यवहार मानने में अनवस्था हो जायगी। किञ्च—हानादि-ज्ञान से हानादि-व्यवहार का असम्भव भी है ।