खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रामाण्यं चेश्वराभिसन्धौ साधयिष्यते । सिद्धार्थानीं श्रुतीनामन्यपरत्वमपि यदि स्यात्तथापि पदसमन्वयबलेन तामु प्रतीयमानमर्थमबाधितमादायैव तासामन्यपरिमवनात्, धियां स्वतःप्रामाण्यस्य बाधकैकापोद्यत्वात् । बन जाय, तब भी छान्दोग्य ( ६।२।१) की 'एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' और वृहदारण्यक ( ६।२।१) की 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतियाँ ही अद्वैत में प्रमाण हैं । शंका—प्रथम तो १चार्वाकादिकथित दोषों से वेद ही अप्रमाण है । उसमें भी स्वतःसिद्ध ब्रह्म का प्रतिपादक उपनिषदें तो २मीमांसक युक्तियों से अप्रमाण ही हैं । समाधान—श्रुतियों के प्रामाण्य तथा स्वतःसिद्ध ब्रह्म की प्रतिपादक उपनिषदों के प्रामाण्य की सिद्धि तो 'ईश्वराभिसन्धि' नामक अपने अन्य ग्रन्थ में करेंगे । शंका—उपनिषदों का ब्रह्माद्वैत में तात्पर्य नहीं, किन्तु एक ही ब्रह्म ( ईश्वर ) है, ब्रह्म ही उपासनीय है, इत्यादि अर्थ में ही तात्पर्य है । समाधान—यदि स्वतः- सिद्ध अद्वैत की प्रतिपादक उपनिषदों का 'एक ईश्वर है, केवल ब्रह्म ही उपासनीय है' इस अर्थ में तात्पर्य मानें, तो भी श्रुति 'एकम्' और 'ब्रह्म' इन पदों के अन्वय से प्रतीयमान अद्वैत अर्थ को ग्रहण करके ही द्वैत का बाध कर देगी । १ नास्तिक लोग पुत्रेष्टि करने पर भी पुत्र के न होने से वेद में अनृतत्व ( मिथ्या-कथन ) तथा 'उदिते जुहुयात्' कहकर 'श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति' इस प्रकार निषेध करने से व्याघात ( आपस में विरोध ) दोष देते हैं । किन्तु यह उनका भ्रम है, क्योंकि 'पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत' इस श्रुति का आशय यह है कि पुत्रोत्पत्ति के सब लौकिक कारण रहते हुए भी यदि किसी पापवश पुत्र न होता हो, तो इस इष्टि से पाप की निवृत्ति द्वारा पुत्र होता है । इसी तरह अग्निहोत्र का यह प्रकार है कि उदित होम सदा उदय में ही करें और अनुदित होम सदा अनुदित में ही करें । यदि इसके विपरीत करें, तो 'श्यावो०' इत्यादि निषेध के भागी होंगे । अतः अनृतत्व, व्याघात आदि दोष नहीं हैं । यद्यपि 'ईश्वराभिसन्धि' ग्रन्थ अब मिलता नहीं, परन्तु सम्भव है कि उसमें ऐसे ही परिहार हों । २ मीमांसक लोग कहते हैं कि 'सोमेन यजेत', 'न कलञ्जं भक्षयेत्' इत्यादि वेदवाक्य शुभकर्म में प्रवृत्ति तथा अशुभ से निवृत्ति कराते हैं, अतः प्रमाण हैं । उपनिषद् तो सिद्धस्वरूप ब्रह्म का प्रतिपादन करती हैं, प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं बतलातीं, अतः प्रमाण नहीं हैं । यदि प्रमाण भी हों, तो शरीर से व्यतिरिक्त आत्मा की प्रतिपादक होने से कर्मकाण्ड के अङ्ग हैं, क्योंकि जो शरीर से पृथक् आत्मा को मानते हैं, वे ही स्वर्गादि फलवाले कर्मकाण्ड में प्रवृत्त हो सकते हैं । उपनिषद् स्वतंत्र-प्रमाण नहीं है । किन्तु यह उनका भ्रम है, उपनिषद् में भी 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः' इत्यादि विधिवाक्य हैं, जिनसे श्रवणादि में प्रवृत्ति होती है । 'ब्रह्मविद् परमेति' इत्यादि स्वतंत्र फल हैं, अतः वे भी स्वतंत्र शास्त्र एवं प्रमाण हैं ।