BharatKosha
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

Page 68 of 610

Read in context
Page 68

परिच्छेद ] अद्वैत में प्रमाण-विचार ५३ न च तया धिया स्वस्य स्वविषयस्य च स्वरूपावगाहने स्वरूपलक्षणो भेदः प्रकाशित एव स्यादिति वाच्यम्; 'पुरोवर्ति रजतम्' इति भ्रान्तौ पुरोवर्त्यात्मनो रजतात्मनश्च प्रकाशे भेदग्रहापत्तेः । धर्मविशेषमन्तर्भाव्य स्वरूपस्य भेदत्वे धियोऽपि तथा स्यादिति सैव धीर्न तत्प्रकाशः, तस्मिन् सन्निकर्षाद्यपेक्षायां धियः प्राक् तदसंभवात् । आत्मवदात्मधर्मेऽपि सन्निकर्षानपेक्षा सा इति चेन्न । ग्रहणत्व-स्मृतित्व-प्रमात्वादावपि तथैव स्यादिति । तदेवं सा बुद्धिः श्रुत्या घटपटात्मतया व्यवस्थाप्यमाना कथमात्मनः स्वस्मादेव भेदे प्रमाणीभवितुं प्रभवतीति बाधिकायां बुद्धौ घटपटयोर्भेदे प्रमात्वा-

समर्थन—स्व-प्रकाश ज्ञान का स्व भी विषय है। अतः घट-पट आदि विषय और स्व का स्वरूपलक्षण भेद ज्ञान का विषय है ही। खंडन—स्वरूप भेद नहीं है। क्योंकि यदि स्वरूप को भेद कहें, तो 'इदं रजतम्' इस स्थल में शुक्ति और रजत दोनों के स्वरूप-लक्षण भेद का ग्रह होने से अभेद-भ्रम नहीं होगा, क्योंकि भेद-ग्रह अभेद-ग्रह का विरोधी है। समर्थन—स्वरूपमात्र भेद नहीं, किन्तु वैधर्म्य-विशिष्ट स्वरूप ही भेद है। शुक्ति-रजत का वैधर्म्ययुक्त स्वरूपलक्षण भेद गृहीत नहीं है। अतः 'इदं रजतम्' ऐसा अभेद-भ्रम हो जाता है। खण्डन—बुद्धि का भी स्वरूप भेद नहीं है, किन्तु वैधर्म्य से युक्त स्वरूप ही भेद है। बुद्धि के स्वप्रकाश होने पर भी वैधर्म्य स्व का विषय नहीं है, क्योंकि सन्निकर्ष के बिना वैधर्म्य का भान हो नहीं सकता। वैधर्म्य के साथ 'मनः- संयुक्तात्मसमवेतज्ञान-समवाय' ही सन्निकर्ष हो सकता है। वह ज्ञान-घटित होने से स्व से पूर्व नहीं है। अतः विरोधी (भेद-ग्रह) के न होने से श्रुति घट-पटभेदरूप स्व- विषय के साथ प्रत्यक्ष-बुद्धि के अभेद का बोधन करेगी। समर्थन—वैधर्म्य स्वप्रकाश (ज्ञान) का विषय है। जैसे ज्ञान अपना सन्निकर्ष के बिना ग्रहण करता है, वैसे ही स्व-धर्म का भी ग्रहण करेगा। खण्डन—यदि स्व- प्रकाश ज्ञान को स्व-धर्म का प्रकाशक मानें, तो बुद्धित्व और स्मृतित्व का भी ज्ञान हो जायगा। यदि ज्ञान के स्वप्रकाश होने से ज्ञान-धर्म का भी ज्ञान मान लें, तो ज्ञान के होने पर प्रमात्वादि का जो सन्देह होता है, वह नहीं होगा। तस्मात् इस प्रकार श्रुति द्वारा घट-पट के अभेद रूप से व्यवस्थित प्रत्यक्ष-बुद्धि, अपनी आत्मा घट के—स्व की आत्मा पट से—भेद में प्रमाण कैसे हो सकती है ? अतः बाधक प्रत्यक्षबुद्धि के घट-पट-भेदरूप विषय में अप्रमात्व होने पर अभेद