खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
Page 7 of 610
Read in context( ७ )
और श्रीहर्ष जैसे प्रतिभाशाली कवियों के लिए विभिन्न प्रान्तों के आचार-व्यवहार का ज्ञान कोई बड़ी बात नहीं। श्रीहर्ष की चिन्तामणि-मन्त्र पर भक्ति, नल के विवाह में बारातियों के भोजन में मद्य-मांस का प्रयोग और श, ष, स; ण, न; व, ब; य, ज तथा ष, क्ष एवं ख की समानता भी उन्हें बङ्गाली नहीं सिद्ध कर सकती। मन्त्र-तन्त्रवाद केवल बङ्गाल की ही चलन नहीं। क्षत्रिय राजा के विवाह में मद्य-मांस का प्रयोग भी बंगाल के ही आचार को इंगित नहीं करता। उपर्युक्त शब्दों का साम्य भी आलंकारिकों ने तत्तत् अलंकार बनाने में मान लिया है। आचार्य श्रीरघुवर मिठ्ठलाल शास्त्री तथा डा० सु० कु० दे ने तो अनेक पुष्ट प्रमाणों से श्रीहर्ष के बंगाली होने के वाद का खण्डन किया है। कुछ लोग 'आदिशूर द्वारा साथ में लाये हुए चार ब्राह्मणों में एक ये हैं' यह कह- कर श्रीहर्ष को वंगवासी सिद्ध करना चाहते हैं। किन्तु वह भी ठीक नहीं जँचता। कारण यदि आदिशूर उन्हें बंगाल में लानेवाले माने जायँ, तो श्रीहर्ष को अपने काव्य में उनका कुछ वर्णन तो करना ही चाहिए था। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके विपरीत उन्होंने कान्यकुब्जेश्वर का वर्णन कर उनके द्वारा बहुमान करने की ही बात लिखी है। इसलिए यही निष्कर्ष निकलता है कि वे कान्यकुब्ज प्रान्त के थे। उनका विशेष निवास काशी या कन्नौज में होता था। प्रबन्धकोश और चाण्डू पण्डित द्वारा भी इसीका समर्थन होता है। हम समझते हैं कि इस विषय में भी डा० चण्डिकाप्रसाद का अनुमान ही बहुत कुछ सही है, कारण उसमें अनेक अन्तःसाक्ष्य और बहिःसाक्ष्य दिये गये हैं। वे लिखते हैं कि “यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय, तो नैषध में ही स्वयं श्रीहर्ष अपने प्रिय (जन्म) प्रदेश का उल्लेख करते पाये जाते हैं। चाहे हम इसे मनुष्य की दुर्बलता कहें, चाहे सहज धर्म होता यही है कि न चाहते हुए भी मनुष्य हृदय को प्रिय लगनेवाली वस्तु की ओर बरबस संकेत कर ही देता है। कालिदास ने मेघ को बे-रास्ते भी चलकर उज्जियिनी अवश्य पहुँचने की सलाह दी है'।” “श्रीहर्ष ने भी कीर (तोते) के मुख से नव-दम्पती नल-दमयन्ती का वर्णन करवाते हुए अपने प्रिय प्रदेश के प्रति अपना प्रेमोद्गार व्यक्त करवा दिया है। कीर कहता है : 'जिस प्रकार गङ्गा-यमुना दो नदियों का हार पहने, जन-मन को प्रिय लगनेवाले 'मध्यदेश' से युक्त तथा 'अन्तर्वेदि' प्रान्त से सुशोभित वसुमती को धारण किये हुए, चन्द्रमा के प्रकाश से उल्लासित (ऊर्मिल) सागर की शोभा होती है, उसी प्रकार धवल (मुक्ता) हार-समन्वित अतिरम्य कटिप्रदेशवाली प्रिया को गोद में लिये हुए आप उसके मुख- चन्द्र से प्रफुल्लित हो रहे हैं'।"
१. 'वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां ।' सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूरूज्जयिन्याः मेघदूत, पूर्वमेघ । २ 'एतां धरामिव सरिच्छवि-हारिहारा-मुल्लासितस्वमदमाननचन्द्रभा बिभ्रद् विभासि पयसामिव राशिरन्तर्वेद्दिश्रियं जनमनःप्रियमध्यदे (नैषध,