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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७३ किं च ये ते वैधर्म्ये भेदौ ते किं घटादितो भिन्ने धर्मिणि निविशेते, किमभिन्ने, परस्परविरुद्धयोरनयोः पृथग्भूतस्य प्रकारस्यासंभवात् । आद्ये येन भेदेन भिन्नत्वं वैधर्म्याश्रयोर्मन्तव्यं तत्रापि पर्यनुयोग इत्यनवस्थायां पर्यवसानं स्यात् । सन्त्वनन्ता एव भेदा इति चेन्न । क्रमेण तेषामा- श्रयसम्बन्धे, सावधिसत्त्वे वस्तुनि तदन्वयासंगतिरेव । अथ जायमानं वस्तु युगपदेव ते भेदाः परिश्रमन्ते । तदा किं भेदविशेषिते किं भेदव्यवस्थितिरिति किं विनिगमकम् ? विशेषाभावादन्योन्यकलहं तेषां कः समाधातुमीष्टे ? चरमचरमस्वीकार्येण च भेदेन प्रथमप्रथमस्वीकृतभेदोपयोगसिद्धेः, अग्रे धावन् पश्चाल्लुप्यमानो विस्मरणशीलश्रुतवत् स भेदप्रवाहः किमालम्बेत ? एवमेवंविधे विषयेऽन्यत्रापि । फिर जो वैधर्म्य भेद हैं, क्या वे घटादि से भिन्न धर्मी पटादि में रहते हैं या अभिन्न धर्मी में ? परस्पर विरुद्ध इन दोनों से पृथग्भूत ( भेदाभेद या भेदाभेद से रहित ) अन्य प्रकार असम्भव है; क्योंकि परस्पर विरोध में प्रकारान्तर नहीं होता । यदि भिन्न धर्मी में भेद मानें, तो जिस भेद से वैधर्म्य और आश्रय को भिन्न मानेंगे, वह भेद भी भिन्न धर्मी में मानना होगा—इस रीति से भेद की परम्परा मानने पर अनवस्था होगी । प्रश्न—यदि धर्मी में अनन्त भेद रहें, तो क्या दोष है ? उत्तर—यदि क्रमशः उनका आश्रय से सम्बन्ध मानें, तो सान्त वस्तु ( कार्य ) में उन दोनों का सम्बन्ध नहीं होगा । यदि कहें कि जायमान वस्तु को एक काल में ही वे भेद प्राप्त होते हैं, तो किस भेद से विशिष्ट में कौन-सा भेद रहता है—इसमें क्या विनिगमक है ? अमुक भेदविशिष्ट में अमुक भेद रहता है, इसमें कोई विशेष प्रमाण तो है नहीं । फिर इन भेदों के आश्रय से सम्बन्ध की व्यवस्था कौन करेगा ? साथ ही चरम-चरम स्वीकार्य भेद से प्रथम-प्रथम स्वीकृत भद के उपयोग की सिद्धि होगी । इससे आगे दौड़ता और पीछे से नष्ट होता् हुआ वह भेद-प्रवाह श्रुत ( पठित ) को विस्मृत कर जानेवाले छात्र के तुल्य किसे अवलम्बन करेगा ? इसी तरह 'गोत्व-विशिष्ट में गोत्व रहता है या गोत्व-रहित में ?' इत्यादि विकल्पकर गोत्वादि धर्मों का भी निरास करना चाहिए । १०