खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in contextपरिच्छेद ] भेद-खण्डन का अनुवाद ७७ मैवम्; न वयं भेदस्य सर्वथैव असत्त्वमभ्युपगच्छामः । किन्नाम, पारमार्थिकम- सत्त्वम् । अविद्याविद्यमानत्वं तु तदीयमिष्यत एव, तदेव च कार्यकारणभावोपयोगी । एतेन एकमेवेत्येवकारव्यवच्छेद्येन, अद्वितीयमिति द्वितीयेन, नाना नेति नानात्वेन, किञ्चनेत्यनेन बहुना विना नोपपद्यमानेन व्याघात इत्यपि प्रत्यादिष्टम् । श्रुतिभिश्चाद्वैतार्थिभिः पारमार्थिकमद्वैतं प्रतिपाद्यते । न च पारमार्थिकमतिः अपारमार्थिकधिया शक्यबाधा । मा भूत् शुक्तिरजतधिया परमार्थशुक्तिमतिबाधः । यत्र तु 'अग्निरनुष्णः' इति बुद्धेरुष्णज्ञानोपजीवनात् उष्णबोधेनानुष्णबुद्धिबाधस्तत्र द्वयोरप्यविद्याविद्यमानत्वाद् बाधो युक्तः । ननु तत्रापि तर्ह्यनुष्णताऽपि पारमार्थिक्येव साध्यतामबाधनाय । मैवम् ; अनुष्णताया जलादिदृष्टान्तसजातीयायाः शीताद्यव्यावृत्तस्वरूपायाः प्रसाधनेन उत्तर—व्यावहारिक नानात्व श्रौत-बुद्धि का उपजीव्य है, अतः उस नानात्व का बाध न हो । किन्तु पारमार्थिक नानात्व तो उपजीव्य है नहीं, इसलिए श्रौत-अद्वैत- बुद्धि से पारमार्थिक नानात्व का बाध हो ही सकता है । व्यावहारिक नानात्व (भेद) तो हम भी मानते ही हैं और वही कार्य-कारणभाव का उपयोग है । प्रश्न—'एकमेव' यहाँ 'एव' विशेषण विजातीय भेद के बिना अनुपपन्न है, 'अद्वितीय' विशेषण द्वितीय के बिना अनुपपन्न है, 'न नाना' यह निषेध नानात्व के बिना अनुपपन्न है और 'किञ्चन' (कुछ है) यह कथन बहुत्व के बिना अनुपपन्न है । अतः अर्थापत्ति से सिद्ध विजातीय भेदादि से अद्वैत-श्रुति का बाध क्यों नहीं होता ? उत्तर—'एवकार' आदि विशेषणों की उपपत्ति तो व्यावहारिक भेद आदि से भी हो सकती है और श्रुति से पारमार्थिक अद्वैत का ही बोध होता है । अतः विषय-भेद होने से व्यावहारिक भेदादि से पारमार्थिक अद्वैत का व्याघात नहीं होगा । अन्यथा शुक्ति-रजतबुद्धि से परमार्थ-शुक्तिबुद्धि का भी बाध हो जायगा । जहाँ प्रतियोगी रूप से उष्णत्व-ज्ञान की उपजीवक होने के कारण दुर्बल 'वह्नि अनुष्ण है' इस अनुमिति का 'वह्नि उष्ण है' इस स्पार्शन प्रत्यक्ष से बाध होता है, वहाँ दोनों ज्ञानों के व्यावहारिक होने से उष्णत्व के प्रत्यक्ष से अनुष्णत्वानुमिति का बाध उचित ही है। प्रश्न—जैसे श्रुति का विषय परमार्थ सत् है, वैसे ही 'वह्नि अनुष्ण है' इस अनुमिति का विषय भी परमार्थ सत् क्यों न माना जाय ? उत्तर—जल आदि में दृष्ट और शीतादि अव्यावृत्तरूप अनुष्णत्व व्यावहारिक ही है । अतः प्रत्यक्ष से उसका बाध