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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

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ढूँढ़ने चला था वह वहीं मिल गया। आखेट के लिये निकला हुआ राजा कवि की रचना को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उन्हें राजधानी चलने को कहकर शिकार के लिये चल पड़ा, इधर कवि की रचना को लेकर राजा चलते बने और उधर जब कवि फटे कपड़े पहने, सुदामाजी की तरह राजमहल के फाटक पर पहुँचा तो उसे भी प्रवेश का अधिकार न मिल सका। निराश होकर उसे वैसे ही लौटना पड़ा जैसे प्रायः गुणी एवं विद्वान् भी बाह्याडम्बर के अभाव में तिरस्कृत होते हैं। राजा ने कवि के इस श्लोक को अपने कक्ष में स्वर्णाक्षरों में अङ्कित कराया था। एक वर्ष बाद वह एक बार शिकार पर निकला। राजा एक सप्ताह के लिये राजधानी से बाहर गया था, किन्तु दूसरी रात को पड़ाव निकट ही होने से वह महल में लौट आया। उसने अपनी शय्या पर रानी के साथ किसी अन्य व्यक्ति को सोते हुए देखा। अत्यन्त क्रोधावेश में तलवार से दोनों का काम तमाम करने ही वाला था कि उसका ध्यान उन स्वर्णाक्षरों की ओर गया 'सहसा विदधीत न क्रियाम्' इस वाक्य को देखते ही राजा ने उन दोनों को जगाकर फिर उन्हें दण्ड देने का निश्चय किया। जब उसने उन दोनों को जगाया तो यह देखकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि रानी के साथ उसका एकलौता पुत्र सोया था जिसे एक दाई चुरा ले गई थी और जो उसी शाम को मिल गया था। राजा ने उस कवि का पता लगाया जिसके लिखे श्लोक की पंक्ति ने राजा को शोकसागर में डूब जाने से बचाया और उसे अतुल धनराशि से सम्मानित किया।

कवि के व्यक्तिगत जीवन के विषय में उसका एकमात्र महाकाव्य एकदम मौन है। किरातार्जुनीयम् से केवल इतना ही हम कह सकते हैं कि ये शैव थे। अपने पिता, पितामह या गुरु किसी का भी उल्लेख इन्होंने 'किरातार्जुनीयम्' में नहीं किया है जैसा अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं में अपना परिचय दिया है। 'अवन्तिसुन्दरीकथा' में दण्डी ने अपने पूर्वजों का विस्तृत वर्णन दिया है। इसके अनुसार दक्षिणभारत में कौशिक गोत्र के ब्राह्मण रहते थे जो बाद में अचलपुर (बरार के अन्तर्गत एलिचपुर) में आकर बस गये। इसी वंश में 'नारायणस्वामी' उत्पन्न हुए। इनके पुत्र दामोदर हुए, यही दामोदर कवि 'भारवि' नाम से विख्यात हुए। भारवि पहले क्षेत्रीय नरेश विष्णुवर्धन के आश्रित थे फिर वे राजा दुर्विनीत के मित्र हो गये। दुर्विनीत ने 'किरातार्जुनीयम्' के सर्वाधिक क्लिष्ट पन्द्रहवें सर्ग पर टीका भी लिखी। अन्त में भारवि पल्लववंशी सम्राट् सिंहविष्णु के दरबार में रहने लगे। भारवि का पुत्र मनोरथ' था। उसका चौथा पुत्र वीरदत्त था जिसने गौरी से विवाह किया; इसी वीरदत्त और गौरी का पुत्र था दण्डी।

अवन्तिसुन्दरीकथा के अनुसार कवि का निवास स्थान एलिचपुर ही सिद्ध होता है, किन्तु स्वर्गीय प्रो० आर० आर भागवत ने निम्न श्लोक में आये सह्य पर्वत के आधार पर इनका निवास स्थान दक्षिण भारत में माना है :-

उरसि शूलभृतः प्रहिता मुहुः प्रतिहति ययुरर्जुनमुष्टयः ।
भृशमया इव सह्यमहीभृतः पृथुनि रोधसि सिन्धुमहोर्मयः ॥ ( १७. ५)