कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context५० हिन्दी कुलार्णव सन्तुष्ट होता है और उसके अभीष्ट पद को प्रदान करता है। इसी क्रम से मध्याह्न या सायाह्न में भी पूजा की जा सकती है। उसका भी वही माहात्म्य है। जो साधक तीनों सन्ध्याओं में एक मास तक यह पूजा करता है, वह सिद्ध होकर पृथ्वी पर देववत् विहार करता है। माघ शुक्ल की प्रतिपदा के दिन निराहार रहकर स्नानपूर्वक श्वेत वस्त्र पहन सायं सन्ध्या करे। फिर पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर चिद्रूपा देवता का ध्यान करते हुए चन्द्रमा के अस्त होने के समय तक एकाग्रचित्त से जप करे। इस प्रकार शुक्ल चतुर्दशी तक प्रतिदिन पूजन करे। पूर्णिमा के दिन यथा- शक्ति शक्तियों और कौलिकों की पूजा करे। भक्तिपूर्वक शुक्लपक्ष का यह पूजन जो साधक करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर सब लोगों से पूजित होता है और शिव-सान्निध्य को प्राप्त करता है। शुक्लपक्ष के ही समान कृष्णपक्ष का पूजन भी वैसा ही फलप्रद है। इस संसार में देववत् सभी सुखों का उपभोग कर वह परमपद को पाता है, इसमें सन्देह नहीं। कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा को स्नान-उपासना के द्वारा विशुद्धात्मा हो पूर्वोक्त न्यासों को करे। फिर जीवलोक के सो जाने पर आनन्दपूर्वक महानिशा में पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर पाँच रङ्गों के चूर्ण से चित्रित अष्टदलकमल बनावे। उस पर कांसे का सुन्दर कलश मधु से भरकर स्थापित करे। कलश पर घृत का दीपक जलाकर स्थापित करे। दीपक की बत्ती अनामिका के समान मोटी हो। उत्तर की ओर मुखकर साधक कलश के सामने बैठे और उक्त दीपक की ज्योति में आवरण- सहित देवी का ध्यान कर विधिवत् उसकी पूजा करे। फिर यौवनोल्लास से युक्त होकर दीपस्थ देवता का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से १०८ बार जप करे। इस प्रकार कृष्ण चतुर्दशी