कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextग्यारहवां उल्लास कुलाचार-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं कुलाचार-क्रम को सुनना चाहती हूँ । कृपया उसे कहिए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। स्नान किये बिना या गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से अलंकृत हुए बिना या शरीर में न्यास किये बिना कुलपूजा नहीं करनी चाहिये । मांस के बिना पूजा, मद्य के बिना तर्पण और शक्ति के बिना जो पान किया जाता है, वह निष्फल होता है । चक्रपूजा अकेले न करे और न एक पात्र में पूजन करे । न एक हाथ से पूजा करे और न एक हाथ से पान करे । पशु के निकट मत्स्य-मांस और आसव के द्वारा पूजन न करे । प्रणाम कर चक्र में प्रवेश करे और प्रणाम करके ही उससे बाहर जाय । हे देवि ! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं । कुलाचारी के गृह में पहुँचने पर माँग कर अमृतान्न ग्रहण करे । उसके अभाव में जल पिये । कुलाचारी के द्वारा दिये हुए पात्र को नमस्कार कर ग्रहण करे । यदि गुरुदेव या उनके पुत्र या अपने से ज्येष्ठ कौलिक उसी ग्राम या नगर में निवास करते हैं, जहाँ कि साधक रहता है, तो उनकी अनुमति से ही कुलद्रव्यों का सेवन करना चाहिये । अन्यथा पाप होता है । चक्र के मध्य में शुद्ध होने के विचार से जो हाथ आदि धोता है, वह मूर्ख आपत्ति में पड़ता है। जो इस अवसर पर मल-मूत्र- अधोवायु का विसर्जन करता है, उसे पातक लगता है। चक्र के बीच में घट के टूट जाने या पात्र के गिर जाने या दीपक के बुझ जाने से जो दोष होता है, उसकी शान्ति के लिए पुनः श्रीचक्र-