लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextमिश्रकव्यवहारः । ( १०३ ) तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ छ, रसोंके अलग २ स्वादके भोजन बनाये जाँय तो कितनी तरहके व्यञ्जन बनेंगे ? सो कहो ॥ १ ॥ मूषान्यासः--८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ लब्धा एकद्वित्र्यादिमूषावहनसंख्याः । ८ २८ ५६ ७० ५६ २८ ८ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ एवमष्टमूषे राजगृहे मूषावहनभेदाः २५५ । अथ द्वितीयोदाहरणम्- न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ - लब्धा एकादिरससंयोगेन पृथग्व्यक्तयः । ६ १५ २० १५ ६ १ १ २ ३ ४ ५ ६ एतासामैक्यम् ६३ । इति मिश्रकव्यवहारः । फैलाव-पहले उदाहरणमें आठ खिडकियोंके वायुके भेद निकालने हैं इस कारण आठसे लेकर अङ्क एकस्थान बढाकर व्यत्यय ( उलटे ) लिखें- ८/१ ७/२ ६/३ ५/४ ४/५ ३/६ २/७ १/८ फिर उसके नीचे क्रमसे एक, दो इत्यादि अङ्क लिखें, फिर यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार कोई अङ्क है नहीं, जिसको पहली पहल आठसे गुणा किया जाँय इस कारण आठहीमें नीचेके लिखे हुए एकका भाग दिया तब आठ ८ ही लब्धि हुए. फिर इस अङ्कको एक जगह अलग लिखा फिर दूसरा अङ्क ७ सात है उससे आठ ८ को गुणा किया तब ५६ हुए, इसमें उसी ७ सातके नचे लिखे हुए २ दोका भाग लिया तब २८ अट्ठाईस लब्धि हुए. इसको भी पहले आठके धोरे लिखा फिर इन २८ को ऊपरकी पंक्तिमें तीसरा अङ्क जो ६ छ है, उससे गुणा किया और छके नीचे अङ्क ३ तीनका भाग लिया तब ५६ छप्पन्न मिला, इसको पहले लिखे हुए अट्ठाईसके आगे लिखा इसी प्रकार अन्ततक विधि करी तो अलग २ एक एक खिडकीके ८ आठ भेद दोदोके २८ अट्ठाईस, तीन तीनके ५६, चार चारके ७० सत्तर, पांच पांचके ५६,