लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextश्रेढीव्यवहारः । (१०७) यही एकसे ९ नौतक अंकोंके घनोंका योग है. इसी प्रकार जितने चाहे उतने अंकोंका वर्गैक्य घनैक्य जान सकता है ॥ यथोत्तरचयेऽन्त्यादिधनज्ञानाय करणसूत्रम्- जहाँ पहले दिन कुछ धन दे, फिर प्रतिदिन कुछ बढ़ती दे तहाँ मध्यधन, अन्त्यधन, सर्व धन (अर्थात् जितने दिनों तक दिया उसके मध्यमें कितना दिया और अन्तके दिन कितना दिया, तथा सब दिनोंमें कितना धन दिया.) इसके जान- नेके वास्ते रीति एक श्लोकमें लिखते हैं ॥ व्येकपदघ्नचयो मुखयुक्स्यादन्त्यधनं मुखयुग्दलितं तत् ॥ मध्यधनं पदसंगुणितं तत्सर्वधनं गणितञ्च तदुक्तम् ॥ ३५ ॥ अन्वयः-व्येकपदघ्नचयः मुखयुक् अंत्यधनं स्यात्। तत् सुखयुक् दलितं मध्य धनं स्यात् । तत् पदसंगुणितं सर्वधनं स्यात् । तत् गणितं च उक्तम् ॥ ३५ ॥ अर्थः-(जो धन बढाकर दिया जाता है उसको चय कहते हैं.) एक करके हीन पदसे चय धनको गुणा करे, फिर उसमें पहले दिनके धन (मुख) को जोड दे तब अन्तके दिनका दिया हुआ धन मालूम हो जाता है, उस मालूम हुए अन्तके धनमें मुख (आदिदिन) का धन जोड दे. फिर आधा कर ले तब जो रहेगा वह मध्यके दिनका दिया हुआ धन होगा और इसी मध्यधनको पदसे गुणा कर दे. तब जो कुछ धन सब दिनोंमें दिया है सो मालूम होता है. इस रीतिको गणितके जाननेवाले गणितशब्दसे व्यवहार करते हैं ॥ ३५ ॥ उदाहरणम्-- आद्ये दिने द्रम्मचतुष्टयं यो दत्त्वा द्विजेभ्योऽनुदिनं प्रवृत्तः ॥ दातुं सखे पञ्चचयेन पक्षे द्रम्मा वद द्राक्कति तेन दत्ताः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यः आद्ये दिने द्विजेभ्यः द्रम्मचतुष्टयं दत्त्वा अनुदिनम् पञ्चच- येन दातुम् प्रवृत्तः तेन पक्षे कति द्रम्माः दत्ताः इति द्राक् वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जो पुरुष पहले दिन ब्राह्मणोंको ४ चार द्रम्म देकर प्रतिदिन पांच पांच बढाकर देनेको प्रवृत्त हुआ तो उस पुरुषने पक्षभर (१५ दिन) में कितने द्रम्म दिये ? यह शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः--आ ० ४। च ० ५। ग ० १५. मध्यधनम् ३९