लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextभूमिका । ( ६ ) श्रीसोन्हदेवेन मढाय दत्तं हेमादिना किञ्चिदिहापरैश्च ॥ भूम्यादि सर्वं परिपालनीयं भविष्यभूपैर्बहुपुण्यवृद्धयै ॥ १६ ॥ स्वस्ति श्रीशके ११२८ प्रभवनामसंवत्सरे श्रीश्रावणे मासे पौर्णमास्यां चन्द्रग्रह- णसमये श्रीसोन्हदेवेन सर्वजनसन्निधौ हस्तोदकपूर्वकं निजगुरुरचितमढायाग्रस्थानं दत्तं तद्यथा- इयां पाटणीं जे कणे उघटे तेहाचा जो सिन्दू जी राउला होता ग्रोहका प्रासीं तो मठा दिन्हला ब्राह्मणाजें दिकहे ब्रह्मोत्तरतं ब्राह्मणी दिन्हले ग्राहकापासि दाह्माचा वीसोवा असुपाठी गिधवग्राहकापासि । पत्र पोफासि ग्राहकापासि पहिवाहिले आधीं आदाणा चीलोमठा दिन्हला जेति घाणे वाहति तेतियां प्रतिपालि पलीत ठा जेम विजेने मंटीचे नमाय-नवावे मापा उगठा अर्द्ध अर्द्ध मापाचे हरिभूपाचे स्तक तथा भूमिः चतुराघाटविशुद्धः ३०६ ग्राम- वाले-कामतामध्यथाकल पण्डिता- कालतु-मीचउरा धामोजीची सोढीआ ॥ कोई ऐसा कहते हैं कि भास्कराचार्य अपने गुरुकुलमें पढतेथे तब इनके गुरुने इनकों सर्वशास्त्रप्रवीण रूपवानोंमें धुरीण और कुलीन देखकर अपनी कन्याके संग विवाह करनेको निश्चय किया था और कन्याकी भी इच्छा इनहीके सङ्ग विवाहकी थी, परन्तु विद्या पढनेके अनन्तर जब भास्कराचार्यने गृहको जानेका यत्न किया तब गुरुने अपनी कन्याके साथ विवाहके अर्थ कहा परन्तु भास्कराचार्यने गुरुपुत्री जान- कर विवाह न किया और अपने गृहको चले आये तब इनकी गुरुपुत्रीने अन्य पुरुष के साथ विवाह करना स्वीकार न किया और अपना समय बिताने लगी तब भास्क- राचार्यजीने संसारमें उसके नामकी प्रसिद्धि रहनेके निमित्त उसीके नामानुसार यह लीलावती ग्रन्थ निर्माण किया । यद्यपि इस प्रकार संसारमें किम्वदन्ती है और कारणवश भी ग्रन्थ बनाये जाते हैं, तथापि विद्वान पुरुषोंका स्वभाव ही लोकोप- कारक होता है ॥ पं०-रामस्वरूपशास्त्री-मुरादाबाद: