लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextक्षेत्रव्यवहारः । ( १२३ ) उदाहरणम्- भुजे द्वादशके यौ यौ कोटिकर्णावनेकधा ॥ प्रकाराभ्यां वद् क्षिप्रं तौ तावकरणीगतौ ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे गणक ! द्वादशके भुजे यौ यौ कोटिकर्णौ भवतः अकरणीगतौ तौ तौ प्रकाराभ्यां क्षिप्रम् अनेकधा वद ॥ ५ ॥ अर्थः-हे गणक ! जिस क्षेत्रमें भुजका प्रमाण १२ बारह कल्पना किया है उस क्षेत्रके अनेक इष्टोंकी कल्पनासे जितने जितने प्रमाणवाले कोटि और कर्ण होंगे वह वह अकरणीगत कोटिकर्ण दोनों रीतियोंसे अर्थात् ऊपर कही हुई रीतिसे और आगेकी रीतिसे भी अनेक प्रकार हमसे शीघ्र कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-इष्टो भुजः १२ इष्टम् २ अनेन द्विगुणेन ४ गुणितो भुजः ४८ इष्ट २ कृत्या ४ एकोनया ३ भक्तो लब्धा कोटिः १६ इयमिष्टगुणा ३२ भुजो १२ ना जातः कर्णः २० ॥ त्रिकेनेष्टेन वा कोटिः ९ कर्णः १५ इत्यादि । पञ्चकेन वा कोटिः ५ कर्णः १३ इत्यादि । फैलाव-यहाँ भुजका प्रमाण १२ कल्पना किया है और कोटि कर्णका प्रमाण नहीं जानते हैं; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्ट कल्पना किया २ इसका द्विगुणा किया तब ४ चार हुए; इससे कल्पित भुज १२ का गुणा किया तब ४८ हुए; इसमें इष्टका वर्गकर ४ मेंसे एक घटाया तब ३ शेष रहे; इनका भाग दिया तब १६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri