लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextक्षेत्रव्यवहारः। (१२७) फैलाव-इस क्षेत्रमें कर्ण ८५ पचासी मालूम है; अब भुज और कोटि जाननेके वास्ते उपरोक्त नियमानुसार कर्ण ८५ को २ दोसे गुणा किया तब १७० हुए; इनको इष्ट २ दोसे गुणा किया तब ३४० हुए, इनमें इष्ट २ दोके वर्ग ४ में १ मिलाकर ५ का भाग दिया तब ६८ अडसठ लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है. अब कोटि ६८ को इष्ट २ से गुणा किया तब १३६ हुए इनमें कर्ण ८५ को घटाया तब ५१ शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है. जब चार ४ को इष्ट माना तब कर्ण ८५ को दोसे गुणा करनेसे वही १७० हुए; इनको इष्ट ४ से गुणा किया तब ६८० हुए; इनमें एक युक्त इष्ट ४ के वर्ग १७ का भाग दिया तब ४० लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है फिर इसी कोटि ४० को इष्ट ४ से गुणा किया तो १६० हुए; इसमें कर्ण ८५ को घटाया तब ७५ शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है; इस प्रकार जैसा इष्ट कल्पना किया जायगा वैसा ही क्षेत्रका आकार बदल जायगा इस कारण इस भेदसे क्षेत्र भी अनेक प्रकारका होगा॥ पुनः प्रकारान्तरेण तत्करणसूत्रं वृत्तम्-- फिर और रीतिसे कर्णप्रमाण जानकर कोटि और भुज जाननेकी रीति लिखते हैं एक श्लोकमें- इष्टवर्गेण सैकेन द्विघ्नः कर्णोऽथवा हतः॥ फलोनः श्रवणः कोटिः फलमिष्टगुणं भुजः॥ ७॥ अन्वयः-द्विघ्नः कर्णः सैकेन इष्टवर्गेण हतः कार्य्यः तदा फलोनः श्रवणः कोटिः स्यात्। अथवा इष्टगुणम् फलम् भुजः स्यात् ॥ ७॥ अर्थः-कर्णका दो २से गुणा करे तो जो अङ्क हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका भाग दे जो लब्धि हो उसको कर्णम घटा दे जो शेष रहे वही कोटिका प्रमाण होगा और कर्णको दोसे गुणाकर जो अंक हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका भाग देनेसे जो लब्धि हो उस इष्टसे गुणा करनेसे जो गुणनफल हो वही भुजका प्रमाण होता है ॥ ७॥