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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा

DevanagariSanskritpublished268 pages

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क्षेत्रव्यवहारः। (१३६) फैलाव-यहाँ भुजप्रमाण २ का वर्ग किया तो ४ हुए, इसमें कोटि- कर्णान्तर अर्थात कलिकाके प्रमाण १/२ का भाग दिया १/२) ४/१ = २/१ ४/१ = ८/१ तब ८ आठ लब्धि हुए; इनमें कोटि कर्णान्तरको एक स्थानमें घटाया और एक स्थानमें जोडा, घटाया | जोडा. ८/१ - १/२ = १६/२ - १/२ = १५/२ | ८/१ + १/२ = १६/२ + १/२ = १७/२ तब १५/२ १७/२ क्रमसे हुए; इनको आधा किया तो क्रमसे १५/४ १७/४ कोटि कर्णका प्रमाण हुआ; यहाँ जलकी गहराईका प्रश्न था, सो जो कोटिका मान १५/४ आया है वही गहराई है. कोट्येकदेशेन युते कर्णे भुजे च दृष्टे कोटिकर्णज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- कोटिके कुछ भुज और कर्ण जानकर कोटिकर्णका रूप जाननेकी रीति एक श्लोकमें- द्विनिघ्नतालोच्छ्रितिसंयुतं यत्परोन्तरं तेन विभाजितायाः ॥ तालोच्छ्रितेस्तालसरोऽन्तरघ्न्या उड्डीनमानं खलु लभ्यते तत्॥ १३॥ अन्वयः-यत् द्विनिघ्नतालोच्छ्रितिसंयुतं सरोन्तरं तेन विभाजितायाः तालसरोऽ- न्तरघ्न्याः तालोच्छ्रितेः यत् तत् खलु उड्डीनमानं लभ्यते ॥ १३ ॥ अर्थः-तालके वृक्षकी उँचाईको दोसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसमें वृक्ष और तालाबके अन्तरको जोड दे तब जो अङ्क हों उनका वृक्ष और तालाबके अन्तरसे गुणी हुई वृक्षकी उँचाईमें भाग दे, तब जो फल हो वही कूदनेका प्रमाण होगा; अर्थात् जो कुछ जाना हुआ कोटिका भाग है उसे भुजसे गुणा करे; जो गुणन फल हो उसमें जाने हुए द्विगुणित कोटिके एक देश और भुज इनके योगसे भाग दे, तब जो लब्धि हो, वह कोटिका खण्ड है, जो कि, कर्णके साथ मिला था और उस खण्डको यदि योगमें घटा दे तब कर्णका प्रमाण मालूम होता है ॥ १३ ॥ उदाहरणम्- वृक्षाद्धस्तशतोच्छ्रयाच्छतयुगे वापीं कपिः कोऽप्यया- दुत्तीर्याथ परो द्रुतं श्रुतिपथेनोड्डीय किञ्चिद्द्द्रुमात् ॥