लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( १४० ) लीलावती । एकका दूसरेमें सूत्र बांधनेसे जहां सूत्रोंका मेल होता है वहांसे पृथ्वीतक जो अन्तर है उसपर रेखा डाली जाती है और अवबाधा वह है कि जो लम्बके इधर उधर दोनों तरफकी पृथ्वी है; उसी लंब और अवबाधाके जाननेके निमित्त उपरोक्त नियमानुसार दोनों बांसोंके प्रमाण १५।१० का परस्पर घात किया तब १५० हुए, इनमें बांसोंके योग २५ का भाग दिया तब ६ लब्धि हुए यही सूत्रोंके योगसे पृथ्वीतक जो लम्ब डाला है उसका प्रमाण है और उन बांसोंके बीचमें भूमि पांच ५ मानी तो इसी भूमिको पहले बांस १५ से गुणा किया तब ७५ हुए, इसमें दोनों बांसोंके योग २५ का भाग लेनेसे ३ लब्धि हुए; यही बडे बांसके ओरकी अवबाधा है; फिर उसी पांचको दूसरे बांस १० से गुणा किया तब ५० हुए; इसमें भी दोनों बांसके योग २५ का भाग दिया तब २ लब्धि हुए; यही दूसरे छोटे बांसकी अवबाधा हुई, जब दश १० को मध्य भूमि कल्पना किया तब उक्त रीतिके अनुसार बडे बाँसके ओरकी अवबाधा ६ हुई और छोटे बांसके ओर की अवबाधा ४ हुई इसी प्रकार १५ को मध्यकी भूमि माना तो क्रमसे १२।८ दोनों अवबाधा हुईं. भूमि चाहे जितनी मानो पर लंब वही ६ मिलेगा, जब यहां भूमि तुल्य भुज माना और वंशतुल्य कोटि माना तब त्रैराशिकसे ही सर्वत्र प्रतीति हो सकती है, जैसे कि, ५ भूमिपर बाँस कोटि मिलती है तो अवबाधापर क्या कोटि मिलेगी ? इस प्रकार दोनों ओरसे वही लम्ब आता है ॥ अथाक्षेत्रलक्षणसूत्रम्- अब अक्षेत्रका लक्षण लिखते हैं- धृष्टोद्दिष्टमृजुभुजं क्षेत्रं यत्रैकबाहुतः स्वल्पा ॥ तदितरभुजयुतिरथवा तुल्या ज्ञेयं तदक्षेत्रम् ॥ १६ ॥ अन्वयः-यत्र एकबाहुतः तदितरभुजयुतिः स्वल्पा अथवा तुल्या तत् धृष्टोद्दिष्टम् ऋजुभुजं क्षेत्रम् अक्षेत्रं ज्ञेयम् ॥ १६ ॥ अर्थः-जिस त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रमें एक भुजसे अन्यभुजोंका योग न्यून हो अथवा तुल्य हो वह ढीठ पुरुषका कहा हुआ क्षेत्र अक्षेत्र है ॥ १६ ॥