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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा

DevanagariSanskritpublished268 pages

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( १४२ ) लीलावती । चतुर्भुजका स्वरूप. त्रिभुजका स्वरूप. ६ ३ २ ६ ३ ━━━━━━━━━━━━━ ━━━━━━━━━━ १२ १२ ९ अथवा इन भुजाओंकी तुल्य सींकोंको मिलाके रखनेसे प्रत्यक्ष क्षेत्रका स्वरूप जान पडता है ॥ आबाधादिज्ञानाय करणसूत्रमार्याद्वयम् । आबाधा आदि जाननेकी रीति आर्याके दो श्लोकोंमें- त्रिभुजे भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो भुवा हृतो लब्ध्या ॥ द्विःस्था भूरूनयुता दलिताबाधे तयोः स्याताम् ॥ १७ ॥ स्वाबाधाभुजकृत्योरन्तरमूलं प्रजायते लम्बः ॥ लम्बगुणं भूम्यर्द्धं स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति १८ ॥ अन्वयः-त्रिभुजे भुजयोः योगः कार्य्यः ततः तदन्तरगुणः कार्य्यः । ततः भुव हृतः कार्य्यः । लब्ध्या द्विःस्था भूः ऊनयुता कार्य्या सा दलिता तयोः आबाधे स्याताम् ॥ १७ ॥ स्वाबाधाभुजकृत्योः अन्तरमूलं लम्बः प्रजायते । भूम्यर्द्धं लम्बगुणं त्रिभुजे स्पष्टम् फलम् भवति ॥ १८ ॥ अर्थः-त्रिभुजक्षेत्रमें दो भुजाओंका योग करे तब जो अङ्क हों उनको उन हीं दोनों भुजाओंके अन्तरसे गुणा करे; जिन ऊपरकी भुजाओंका योग किया है फिर गुण- नफलमें भूमि मानी हुई नीचेकी भुजका भाग दे; जो लब्धि हो वह दो स्थानोंमें रक्खी हुई भूमि मानी हुई भुजामें एक स्थानमें घटा दे और एक स्थानमें जोड दे; उसको आधा आधा कर ले, तब जो अङ्क मिले, वही दोनों भुजाओंकी आबाधा है ॥ १७ ॥ अपनी आबाधा और अपनी भुजका वर्ग करे, उन वर्गोंका अन्तर करे, उस अन्तरका मूल ले, तब जो अङ्क मिले वही लम्बका प्रमाण होता है, भूमिको आधा कर लम्बसे गुणा कर दे तब त्रिभुजमें स्पष्ट फल होता है ॥ १८ ॥ उदाहरणम्- क्षेत्रे मही मनुमिता त्रिभुजे भुजौ तु यत्र त्रयोदशतिथि- प्रमितौ च यस्य ॥ तत्राऽवलम्बकमथो कथयावबाधे क्षिप्रं तथा च समकोष्ठमिति फलाख्याम् ॥ १४ ॥ अन्वयः-यत्र त्रिभुजे क्षेत्रे मही मनुमिता यस्य भुजौ तु त्रयोदशतिथिप्रमितौ तत्र अवलम्बकम् अथो अवबाधे तथा च फलाख्याम् समकोष्ठमिति च क्षिप्रं कथय ॥१४॥

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