लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
Page 160 of 268
Read in context( १४४ ) लीलावती । पृथ्वी है, हे गणितके जाननेवाले ! उस क्षेत्रमें दोनों आबाधा बताओ, लम्ब बताओ और क्षेत्रफल भी शीघ्र कहो ॥ १५ ॥ न्यासः- भुजौ १० । १७ भूमिः ९ अत्र त्रिभुजे भुजयोर्योग इत्यादिना लब्धम् २१ अनेन भूरूना न स्यात् । अस्मादेव भूरपनांताशेषा- र्द्धमृणगता वा दिग्वैपरीत्येनेत्यर्थः । तथा जाते आबाधे ६ । १५ अत उभयत्राऽपि जातो लम्बः ८ फलम् ३६ । फैलाव-यहां लम्बभूमिसे बाहर निकल जाता है, इस कारण यह ऋणाबाधा का उदाहरण कहलाता है. यहां उपरोक्त नियमानुसार दोनों भुजा १० । १७ का योग किया तब २७ हुए; इसको उन हीं भुजाओंके अन्तर ७ से गुणा किया तब १८९ हुए. इसमें भूमि ९ का भाग दिया तब २१ मिलें, इसको भूमि ९ में ऋणबाधा भू जोडा तब ३० हुए; इसका आधा किया तब १५ मिले, यह १७ की आबाधा हुई. अब पहली भुजकी आबाधा जाननेके अर्थ उसी लब्धि २१ को भूमिमें घटाना चाहिये; परन्तु घट नहीं सकती, इस कारण दिग्वैपरीत्य कर दिया, अर्थात भूमिमें लब्धि न घटा कर लब्धि में भूमिको घटाया तब १२ रहे, इसको आधा किया तब ६ हुए, यही ऋणाबाधा है, इस प्रकार दोनों आबाधा ६।१५ हुई, इन ही आबाधाओंसे लम्ब जाननेके लिये पहली भुज १० का वर्ग किया तब १०० हुए, इसी भुजकी आबाधा ६ का वर्ग किया तब ३६ हुए, इनका अन्तर किया तब ६४ बचे, इसका वर्ग- मूल लिया तब पहली आबाधासे लम्ब मिला ८ । इसी प्रकार दूसरी भुज १७ का वर्ग किया तब २८९ हुए, इसी भुजकी आबाधा १५ का वर्ग किया तब २२५ हुए इनका अन्तर किया तब ६४ बचे इनका मूल लिया तब वही लम्बप्रमाण ८ मिला, इस प्रकार दोनों आबाधाओंसे एक ही लम्ब मिला. अब क्षेत्रफल जाननेको भूमिके आधे ४ १/२ को लम्ब ८ से गुणा किया तब ३६ मिले. यही क्षेत्रफल है ॥ चतुर्भुजे त्रिभुजे चास्पष्टस्पष्टफलानयने करणसूत्रं वृत्तम्- चतुर्भुजमें अस्पष्ट और त्रिभुजमें स्पष्ट फल जाननेकी रीति एक श्लोकमें-