लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( १६४ ) लीलावती । अथ तदेव क्षेत्रञ्चेत्समलंबं तदा न्यासः- मुखोनभूमिं परि- कल्प्य भूमिमिति ज्ञानार्थं त्र्यस्रं क- ल्पितम् ॥ अत्राऽबाधे जातं ३/५ १७२/५ लम्बश्च करणीगतो जातः ३८ ६२२/६२५ अयं तत्र चतुर्भुजसमलंबः लब्धो बाधोनि- तभूमेः समलंबस्य च वर्गयोगः ५०४१ अयं कर्णवर्गः। एवं बृहदाबाधातो द्वितीयकर्णवर्गः २१७६ अनयोरास- न्नमूलकरणेन जातौ कर्णौ ७१ २/५ ४६ १३/२० एवं चतुरस्रे तेष्वेव बाहुष्वन्यौ कर्णौ बहुधा भवतः । एवमनियत- त्वेऽपि नियतावेव कर्णावानीतौ ब्रह्मगुप्ताद्यैः ॥ फैलाव-जब उसी क्षेत्रको समलम्ब बनाया तब पहले कही हुई रीति के अनु- सार अर्थात् पहले यह कह आयें हैं कि; जो समलम्ब विषम चतुर्भुज क्षेत्र है उसके मुखको भूमिमें घटा दे; तब जो शेष रहे उसको भूमि जानें और दोनों भुजोंको भुज मानें; इस रीतिसे एक त्रिभुज बनजायगा तब पहले कही हुई रीति के अनु सार लम्ब लावे; इस रीति के अनुसार मुख २५ को भूमि ६० में घटाया तब ३५ रहे इनको भूमि माना और दोनों भुजोंको भुज माना और लंब भी वही रहा तब क्षेत्रका स्वरूप त्रिभुज हो गया वह यह है- अब यहाँ पहले कही हुई “त्रिभुजे भुजयोरित्यादि” रीतिसे आबाधा लाये तब ३/५ १७२/५ मिली; इनसे लंब साधा तब ३८ ६२२/६२५ हुये यह करणीगत