लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( १७४ ) लीलावती। इन दोनोंका वर्ग किया तब ३५७२।३८०२५ हुए; इनका अंतर किया तब २३०४ बचे; इनका आसन्न मूल लिया तब ४८ मिले यही पहली सन्धि हुई; इसको भूमि ३०० में घटाया तब २५२ बचे; उसीका नाम पीठ है; इसी प्रकार दूसरा लम्ब २२४ और उसकी ओरकी भुज २६० है; इन दोनोंका वर्ग किया तब ५०१७६ । ६७६०० हुए; इनका अंतर किया तब १७४२४ बचे; इनका मूल लिया तब १३२ मिले; यही इस लम्बकी ओरकी सन्धि है; इसको भूमि ३०० में घटाया तब १६८ मिले; यही इस सन्धिका पीठ है; जो लम्बके सम्पातसे नीचेको लम्बका नीचेका खण्ड है, उसके जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "सन्धिर्द्विःस्थः" इत्यादि रीतिके अनुसार पहले लम्बका नीचेका खण्ड जानना है; इस कारण पहले लम्बके १८९ सन्धि ४८ को दो स्थानोंमें लिखा एक स्थानमें परलम्ब २२४ से गुणा किया तब १०७५२ हुए; दूसरे स्थानोंमें अपने कर्ण २८० से गुणा किया तब १३४४० हुए इन दोनों १०७५२ । १३४४० स्थानोंमें परलम्बके पीठ १६८ का भाग लिया तब क्रमसे लम्बके नीचेके खण्डका प्रमाण ६४ और कर्णके नीचेके खण्डका प्रमाण ८० मिला इसी प्रकार दूसरे लम्ब २२४ का सन्धि १३२ है. सोई क्षेत्रका स्वरूप दिखाते हैं-
[Diagram with annotations: Top side: ३१५ Left diagonal/side: १९५, १८९, ८०, ६४, सं. ४८ Bottom: २५२, १६८, सं. १३२, ३०० Vertical lines/diagonals: २२४, २६०, १६६, ९९ ]
इसको दो स्थानोंमें लिखकर एक स्थानपर १८९ लम्बसे गुणा किय तब २१९४८ हुए; और दूसरे स्थानमें अपने कर्ण ३१५ से गुणा किया तब ४१९८० हुए इन दोनों २४९४८ । ४१९८० स्थानोंमें परपीठ २५२ का भाग दिया तब क्रमसे इस लम्बके नीचेके खण्डका प्रमाण ९९ और कर्णके नीचेके खंडका प्रमाण १६६ मिला ॥ दोनों कर्णोंके योगसे नीचेका लम्ब लानेकी रीति एक श्लोकमें- लंबौ भूघ्नौ निजनिजपीठविभक्तौ च वंशौ स्तः ॥ ताभ्यां प्राग्वच्छ्रुत्योर्योगाल्लम्बः कुखण्डे च ॥ ३७ ॥ अन्वयः-भूघ्नौ लम्बौ निजनिजपीठविभक्तौ च वंशौ स्तः। ताभ्यां श्रुत्योः योगात् लम्बः कुखण्डे च प्राग्वत् साध्ये ॥ ३७ ॥