लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
Page 228 of 268
Read in contextतो २०००/३ हुए, इसमें अपने अपने गुणक २ । ४ । १ १/३ का भाग दिया तब २०००/६ २०००/१२ । ६०००/१२ हुए; इनमें हरका भाग दिया, तब ३३३ १/३ । १६६ २/३ । ५०० । हुए,यह क्रमसे तीनों ३० । १५ । ४५ । परिधिका खारीप्रमाण अर्थात् घनहस्त फल हुआ। इति राशिव्यवहारः ॥ अथ छायाव्यवहारः । —-—•✦•—-— अथ छायाव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- दीपकके बालनेसे जो छाया पडती है; उसके मापनेकी रीति एक श्लोकमें कहते हैं:- छाययोः कर्णयोरंतरे ये तयोर्वर्गविश्लेषभक्ता रसाङ्गीषवः ॥ सैकलब्धेः पदघ्नं तु कर्णान्तरं भांतरेणोनयुक्तं दले स्तः प्रभे॥६०॥ अन्वयः-छाययोः कर्णयोः च य अन्तरे तयोः वर्गाविश्लेषभक्ताः रसाङ्गीषद्वः। कार्याः । सैकलब्धेः पदघ्नं कर्णान्तरम् भांतरेण ऊनयुक्तं कार्यं तयोः दले प्रभे स्तः। अर्थः-दोनों छायाओंके अन्तरका वर्ग करें और दोनों कर्णोंके अन्तरका भी वर्ग करें; फिर इन दोनों वर्गोंका भी अंतर करें, जो शेष रहे, उसका ५७६ पांचसौ छियत्तरमें भाग दे तब जो लब्धि मिले उसमें एक और जोड ले उसका वर्गमूल ले उससे कर्णोंके अंतरको गुणा करें; जो गुणनफल हो उसको दो स्थानोंमें लिखे एक स्थानमें छायाओंके अन्तरको घटा दे और एक स्थानमें जोड दे फिर दोनों स्थानोंके अङ्कोंको आधा कर ले वही दोनों छायाओंके प्रमाण होंगे ॥ ६० ॥ उदाहरणम्- नंदचंद्रैर्मितं छाययोरंतरं कर्णयोश्चान्तरं विश्वतुल्यं ययोः ॥ ते प्रभे वक्ति यो युक्तिमान्वेत्त्यसौ व्यक्तमव्यक्तयुक्तं हि मन्येऽ खिलम् ॥ ४१ ॥ अन्वयः-ययोः छाययोः अन्तरं नंदचन्द्रैः मितम्। कर्णयोः अंतरं च विश्वतुल्यम्। ते प्रभे यः युक्तिमान् वक्ति हि मन्ये असौ अव्यक्तयुक्तम् अखिलं व्यक्तं वेत्ति ४१॥ अर्थः-जिन छायाओंका अन्तर १९ उन्नीस है और कर्णोंका अन्तर १३ है, उन छायाओंके प्रमाणको जो बुद्धिमान् कहता है जानता हूं, वह निश्चय करके बीज- गणितसहित सम्पूर्ण पाटीगणितको जानता है ॥ ४१ ॥