लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextछायाव्यवहारः । (२१६) अर्थः-दीपककी उँचाई जाननेके लिये शंकुको शंकु और दीपकके मध्यकी भूमिके प्रमाणसे गुणा करे, फिर छायाके प्रमाणका भाग दे जो लब्धि मिले उसमें शंकुके प्रमाणको जोड दे तब दीपककी उँचाई मिलती है ॥ ६१ ॥ उदाहरणम्- प्रदीपशंकन्तरभूमित्रिहस्ता छायांगुलैः षोडशभिः समाचेत् ॥ दीपोच्छ्रितिरस्यात्कियती वदाऽऽशु प्रदीपशंकन्तरमुच्यतां मे ॥ ४२ ॥ अन्वयः-चेत् प्रदीपशंकंतरभूमिः त्रिहस्ता षोडशभिः अंगुलैः समा छाया तदा दीपोच्छ्रितिः कियती स्यात् इति मे आशु वद प्रदीपशंकन्तरं च उच्यताम् ॥ ४२ ॥ अर्थः-यदि दीपक और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण ३ हाथ है और १६ सोलह अंगुलके प्रमाणकी छाया है, तो दीपककी उँचाई कितनी होगी ? यह मुझसे शीघ्र कहो और दीपक और शंकुका अन्तर भी कहो ॥ ४२ ॥ न्यासः- शंकुः १२ छायांगुलानि १६ । शंकुप्रदीपान्तरहस्ताः ३ । लब्धं दीपकोच्च्यं हस्ताः ११/४ । फैलाव-छायाका प्रमाण तथा दीपक और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण जान- कर दीपककी उँचाई जाननेके लिये शंकु १/२ को शंकु और दीपके मध्यकी भूमि ३ से गुणा किया तब ३/२ हुए; इसमें छाया २/३ का भाग दिया तब ९/४ हुए; इसमें शंकु १/२ को जोडा तब ११/४ हुए; यही दीपककी उँचाई है. प्रदीपशंकंतरभूमानानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- दीपक और शंकुके बीचकी भूमिका प्रमाण जाननेके लिये रीति आधा श्लोक- विशंकुदीपोच्छ्रयसंगुणा भा शंकूद्धता दीपनरान्तरं स्यात् ॥ ऽऽ ॥ अन्वयः-भा विशंकुदीपोच्छ्रयसंगुणा शंकूद्धता दीपनरान्तरं स्यात् ॥ ऽऽ ॥