लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context८ छायाव्यवहारः । ( २१९ ) जगज्जननैकबीजेन सकलभुवनभावनेन गिरिसरित्सुर- नरासुरादिभिः स्वभेदैरिदं जगद्व्याप्तं तथेदमखिलं गणित- जातं त्रैराशिकेन व्याप्तम् ॥ अर्थ:-इसी प्रकार इस छाया व्यवहारमें दीपककी उँचाई आदि त्रैराशिक कल्पना करनेसे भी मिलती है सोई दिखाते हैं-प्रथम छाया ८ से दूसरी छाया १२ जितनी अधिक है उतने छायाके अवयव ४ से यदि छायाओंके अग्रभागोंके अन्तर ५२ की तुल्य भूमि मिलती है तो पहली छाया ८ से क्या मिलेगी ? यहां छायावयवको प्रमाण माना और उसको आदिमें लिखा और छाया ८ को इच्छा माना और अन्य जाति भूमि ५२ को फल मानके फल इच्छाका घात कर प्रमाणका भाग दिया तब १०४ लब्धि हुए; यही पहली छायाके अग्रभागसे दपिक | प्र. फ. इ. पर्यन्तकी भूमिका प्रमाण है; इसी प्रकार दूसरी छाया १२ | ४ ५२ ८ को इच्छा मान कर त्रैराशिक किया तब दूसरी छायाके अग्र- | ५२ गुणा भागसे दीपकके नीचे पर्यन्तकी भूमिका अंगुलात्मक प्रमाण | ८ १५६ मिला तदनन्तर दूसरा त्रैराशिक किया, यदि छाया | भा.४ ) ४१६ ( १०४ तुल्यभुजासे शंकुप्रमाण कोटि मिलता है, तो भूमितुल्य | लब्धि भुजामें क्या मिलेगा इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे दीपककी उँचाई मिलती है यह उँचाई दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिलती है । इसी प्रकार पंचराशिकादि भी त्रैराशि- ककी कल्पनासे ही सिद्ध होता है; जिस प्रकार जन्ममरणरूप संसारके दुःख दूर करनेवाले सम्पूर्ण संसारकी उत्पत्तिके आदिकारण श्रीनारायण विष्णुभगवान करके संपूर्ण संसारके पर्वत नदी देवता मनुष्य और दैत्यादि अपने ही भेदोंसे यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार सम्पूर्ण गणितमात्र त्रैराशिकसे व्याप्त है ॥ यद्येवं तर्हि बहुभिः किमित्याशंक्याऽऽह- यदि त्रैराशिकसे ही सम्पूर्ण गणितमात्र सिद्ध हो जाता है तो फिर पूर्वोक्त बहुतसी रीतियें किस कारण वृथा बनाईं हैं ? इस प्रकार शंका करके उत्तर देते हैं- यत्किंचिद्गुणभागहारविधिना बीजेऽत्र वा गण्यते तत्रैराशिकमेव निर्मलधियामेवावगम्यं विदाम् ॥ एतद्बह्वथास्मदादिजडधीधीवृद्धिवुद्ध्या बुधैस्तद्भे- दान्सुगमान्विधाय रचितं प्राज्ञैः प्रकीर्णादिकम् ॥ ६४ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri