लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextकुट्टकव्यवहारः । (२२१) विभाजितौ यौ भाज्यहारौ तौ दृढसंज्ञकौ स्तः । यावत् विभाज्ये इह रूपं भवति तावत् दृढभाज्यहारौ मिथः भजेत् फलानि अधः अधः निवेश्यानि तदधः क्षेपः निवेश्यः । ततः शून्यं निवेश्यम् उपान्तिमेन स्वोर्ध्वे हते अन्त्येन युते तदन्त्यं त्यजेत् एवम् मुहुः कार्य्यम् इति राशियुग्मं स्यात् । दृढेन भाज्येन तष्टः ऊर्ध्वः फलं स्यात् । हरेण तष्टः अधरः गुणः स्यात् एवं तदा एव यदा ताः लब्धयः समाः स्युः चेत् विषमाः तदानीं यदागतौ लब्धिगुणौ स्वतक्षणात् विशोध्यौ, शेषमितौ तौ स्तः ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ अर्थः-यदि पहले सम्भव हो तो कुट्टक करने के लिये किसी अंकका भाज्यहार और क्षेपमें अपवर्तन दे, जिस अपवर्तनके अंकसे भाज्य और भाजक निःशेष हो जाय, परन्तु क्षेप निःशेष न हों तो उस प्रश्नको ही दुष्ट कह दे, (पहले भाज्यहारका अपवर्तनांक जाननेकी रीति लिखते हैं, ) जिन दो अंकोंमें अपवर्त- न देना हो उनमें परस्पर एक एकमें भाग दे, जो शेष रहे, वही उन दोनों अंकोंका अपवर्तन अंक होता है, इस अपवर्तन अंकसे विभाजित (भाग दिये हुए) भाज्य और हार दृढसंज्ञक होते हैं। जबतक भाग देते देते एक शेष रह जाय तब- तक परस्पर भाग दे, जो लब्धि हों उनको नीचे नीचे लिखता जाय, उन लब्धियोंके नीचे क्षेप रक्खे, तदनन्तर शून्य रक्खे (इस प्रकार अंकोंको रखनेसे एक वल्ली (पंक्ति) बन जायगी (उस पंक्तिमें) उपान्तिक अर्थात् सबसे नीचेके दूसरे अङ्कसे उससे ऊपरके अङ्कको गुणा करे जो गुणनफल मिले उसमें अन्तके अर्थात् सबसे नीचेके अङ्कको जोड दे और फिर अंतके अंकको मिटा दे, इस प्रकार वारंवार करे तो दो राशि हो जायँगी, ऊपरकी राशिको दृढ भाज्यसे तष्टे और नीचेकी राशिको दृढ भाजक (हर) से तष्टे. (और दोनोंके तष्टनेमें लब्धि तुल्य ही ले.) दोनों स्थानोंमें तष्टनेसे जो अंक शेष रहें उनमें नीचेका अङ्क गुणा होगा, ऊपरको अङ्क लब्धि कहा जायगा यह रीति गुणलब्धिकी तब होगी; जब लब्धियोंकी वल्ली सम होगी और यदि लब्धियोंकी विषम वल्ली हो तो जो लब्धिगुण आये हैं उनमें अपने अपने तष्टनेवाले अङ्कोंको घटा दे, तब जो अङ्क शेष रहें वह गुण और लब्धि होंगे ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ उदाहरणम्- एकविंशतियुतं शतद्वयं यद्गुणं गणकपञ्चषष्टियुक् ॥ पंचवर्जितशतद्वयोद्धृतं शुद्धिमेति गुणकं वदाशु तम् ॥ ४४ ॥ अन्वयः-हे गणक ! एकविंशतियुतं शतद्वयं यद्गुणं पञ्चषष्टियुक् पंचवर्जितशतद्व- योद्धृतं शुद्धम् एति तं गुणकम् आशु वद ॥ ४४ ॥