लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context(२२६) लीलावती । अथवा हर ६३ क्षेप ९० में नौ ९ से अपवर्तन दिया तब हार ७ क्षेप ९ हुए; यहाँ पहले कही हुई रीति के अनुसार भाज्य १०० हार ७ का परस्पर ∣ १४ भाग देकर लब्धि नीचे नीचे रखते गये, फिर उन लब्धियों के नीचे क्षेप को ∣ ३ रखा क्षेप के नीचे शून्य रक्खा तब समवल्ली हुई, फिर ऊपर कही हुई रीति के ∣ १० अनुसार उपान्त्य के अङ्क १० से उसके ऊपर के ३ को गुणा किया तो ∣ ० ३० हुए; इसमें अन्त का अंक जोडा और अन्के अंक को मेट दिया तब वल्ली हुई $\begin{matrix} १४ ३० १० \end{matrix}$ यहाँ फिर उपान्त के अंक ३० से उसके ऊपर के अंक १४ को गुणा करा तो ४२० हुए; इसमें अन्त के अंक १० को जोडकर अन्त्य के अंक को मेट दिया, तब सबसे ऊपर के अंक $\frac{४३०}{३०}$ मिले, इन दोनों राशियों को अपने अपने तक्षक १००।७ से तष्टा तो $\frac{३०}{२}$ हुए, इनमें २ गुण हैं और ३० लब्धि है अब ऊपर कही हुई रीति के अनुसार २ गुण को अपवर्तन अंक ९ से गुणा किया तो वही पहला गुणक अङ्क १८ मिला और लब्धि ३० मिली ॥ अथवा पहले भाज्य १०० क्षेप में दश का अपवर्तन दिया तब १०।९ हुए, फिर अपवर्तितक्षेप ९ और हार ६३ में नौ का अपवर्तन दिया तब क्षेप १ हार ७ हुए; इस प्रकार करने से भाज्य १० क्षेप १ हार ७ हुए; यहां पहले कही हुई रीति के अनु- सार भाज्य १० और हार ७ का परस्पर भाग देकर उसका लब्धियों के ∣ १ नीचे क्षेप को लिखा, फिर उसके नीचे शून्य लिखा तो समवल्ली बनी, यहां पहले ∣ २ कही हुई रीति के अनुसार ऊपर के दोनों अंक $\frac{३}{२}$ मिले, यहां गुण २ है, इसको ∣ १ पहले कही हुई रीति के अनुसार हार क्षेप के अपवर्तन अंक ९ से इस गुण २ ∣ ० को गुणा किया तो १८ हुए यही पहले लाया हुआ गुणक अंक मिला और पहले कही हुई रीति के अनुसार भाज्य १०० भाजक ६३ क्षेप ९० से लब्धि मिली, ३० यहां “इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते” इन गुणलब्धि में इष्ट से गुणे हुए अपने अपने तक्षक को जोड दे; इस रीति के अनुसार अनेक प्रकार की गुणलब्धि मिलती है, जैसे ऊपर मिली हुई गुणलब्धि १८।३० में इष्ट १ से गुणे हुए अपने अपने तक्षक ६३।१०० के जोडने से गुणलब्धि मिली ८१ । १३० इसी प्रकार दो २ के इष्ट से गुणलब्धि मिली १४४ । २३० तीन के इष्ट से गुणलब्धि मिली २०७ । ३३० इस प्रकार के जितनी प्रकार के इष्ट मानें जायेंगे; उतनी ही प्रकार की गुणलब्धि होंगी. कुट्टकान्तरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्– कुट्टक में ऋणक्षेप के गुण और लब्धि जानने की रीति आधा श्लोक में– क्षेपजे तक्षणाच्छुद्धे गुणाप्ती स्तो वियोगजे ॥ ५५ ॥