लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( २३० ) लीलावती । गुणाप्ती २ । ११ । "क्षेपजे तक्षणाच्छुद्धे" इति त्रयोविंशति शुद्धौ जाता विपरीतशोधनादवशिष्टा लब्धिः ६ शुद्धौ जाते १ । ६ " इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते" इति वक्ष्यमाणविधिना "धनर्णयोरन्तरमेव योगः" इति बीजो- क्त्या च इष्टगुणितस्वहारक्षेपणेन यथा धनलब्धिः स्यादि- ति तथा कृते जाते गुणाप्ती ७ । ४ एवं सर्वत्र ॥ अथवा "हरतष्टे धनक्षेपे " इति । न्यासः- भाज्यः ५ हारः ३ क्षेपः २ ॥ पूर्ववज्जाते गुणाप्ती २ । ४ एते स्वस्वहराभ्यां शोधिते विशुद्धि ११ । २ जाते "क्षेपतक्षणलाभाढ्या लब्धिः" इति जातौ क्षेपजौ लब्धिगुणौ ११ । २ "शुद्धौ तु वर्जिता" इति शुद्धिजौ भवतः । किन्त्वत्र शुद्धा न भवति । तस्माद्विपरीतशोध- नेन ऋणलब्धिः ६ गुणः १ धनलब्ध्यर्थं द्विगुणे स्वहारे क्षिप्ते सति जाते ७ । ४ फैलाव-भाज्य ५ हार ३ क्षेप २३ यहां पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली बनाई १ फिर पहले कही हुई रीतिके अनुसार उपान्त के अंक से उसके २ ३ ० ऊपरके अंकको गुणा कर उसमें अन्त अंक जोड दिया, फिर अन्तके अंकको मिटा दिया, इस प्रकार जहां तक एक शेष रहा तहांतक बारंबार करनेसे ऊपरकी दो राशियें मिलीं, ४६ २३ इनको भाज्य ५ और हार ३ से तष्टा अर्थात् नीचेकी राशि २३ को हार ३ से तष्टा तो सात लब्धि मिले, फिर ऊपरकी राशि ४६ को भाज्य ५ से तष्टा तो नौ ९ लब्धि मिल सकते हैं, परन्तु ९ लब्धि नहीं लेना चाहिए क्योंकि " गुणलब्ध्योः सममित्यादि " रीतिके अनुसार दोनोंको तष्टनेमें लब्धि समान ही लेना चाहिए; इस कारण नौ ९ लब्धि न लेकर पहलेके बराबर सात ही लब्धि लिये तब दोनों स्थानोंमें तष्टनेपर रहे २ । ११ यही यहां गुण लब्धि हुए; यह धनक्षेपके गुण लब्धि सिद्ध हुए; और उन २ । ११ को अपने २ तक्षक ३ । ५ में से विपरीत रीतिसे घटा दिया तो १ । ६ रहे, परन्तु यहां लब्धि ऋण है क्योंकि उलटी रीतिसे घटाया है, इसको धन करनेके लिए इष्ट २ से गुणा किये हुए अपने २ तक्षकको पहली गुण लब्धिमें