लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( १४ ) लीलावती। अथ वर्गे करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- अब वर्ग करनेकी रीति दो श्लोकोंमें कहते हैं- ( सूत्रं ९ ) समद्विघातः कृतिरुच्यते- अन्वयः-समद्विघातः कृतिः उच्यते। अर्थः-समान दो अंकोंका परस्पर गुणा करनेसे जो फल होता है वह वर्ग कहाता है ॥ ( सू० १० ) अथ स्थाप्योऽन्त्यवर्गो द्विगुणान्त्यनिघ्नाः॥स्वस्वोप- रिष्टाच्च तथा परेऽङ्कास्त्यक्त्वाऽन्त्यमुत्सार्य्यपुनश्च राशिम् ॥ ८ ॥ अन्वयः-अथ अन्त्यवर्गः स्थाप्यः तथा परे अङ्काः द्विगुणान्त्यनिघ्नाः स्वस्वोपरिष्टात् स्थाप्याः। पुनः अन्त्यं त्यक्त्वा राशिम् उत्सार्य्य अन्त्यवर्गः स्थाप्यः निःशेषान्तम् एवमेव कुर्यात्। अर्थः-(यदि ज्यादा अङ्क हों तो) अन्तके अङ्कका वर्ग करके उन्ही अन्तके अंकोंके ऊपर रख देय. और बाकीके अंकोंको द्विगुणित अन्तके अङ्कसे गुणा करके अपने अपने अङ्कके ऊपर रख देय. फिर अन्त्यके अंकको मेट दे और शेष राशि- को हटाकर फिर पूर्वोक्त रीतिसे अन्त्यवर्ग इत्यादि कार्य्य करे. इसी प्रकार जबतक अङ्क निःशेष हों तबतक पूर्वोक्त रीतिसे कार्य्य करें तदनन्तर सब अंकोंको एक २ स्थान बढाकर रक्खे और जोड देय तब फल प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ अत्रोद्देशकः-वर्गके विषयमें उदाहरण- सखे नवानां च चतुर्दशानां ब्रूहि त्रिहीनस्य शतत्रयस्य ॥ पंचोत्तरस्याप्ययुतस्य वर्गं जानासि चेद्वर्गविधानमार्गम् ॥३॥ अन्वयः-हे सखे ! चेत् वर्गविधानमार्गं जानासि तर्हि नवानाम्। चतुर्दशानाम्। त्रिहीनस्य शतत्रयस्य। पञ्चोत्तरस्य अयुतस्य वर्गम् अपि ब्रूहि ॥ ३ ॥ अर्थः-हे प्रिये ! लीलावति ! यदि वर्ग करनेकी रीति जानती हो तो ९ नौ, १४ चौदह, २९७ दोसौ सतानवे, १०००५ दशहजार पाँच इसका अलग अलग वर्ग कहो ॥ ३ ॥ न्यासः-९ । १४ । २९७ । १०००५ एषां यथोक्तकरणेन जाता वर्गाः ८१ । १९६ ॥ ८८२०९ । १००१०००२५ फैलाव-(क) पूर्वोक्त रीतिके अनुसार ९ नौके समान अङ्क नौसे ही गुणा किया तब वर्ग हो गया.