लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( २० ) लीलावती । पंक्ति ५८ अट्ठावनका भाग देनेसे ४ चार शेष रहे. उसके ऊपर विषम अङ्क ९ नौंको उतारा तब ४९ उनंचास हुए इसमें सम अङ्कमें भाग देनेसे लब्धि हुए ७ सातका वर्ग घटाया तब निःशेष होगया. जिसका वर्ग घटाया, उस सातको द्विगुणा १४ करके पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रक्खा, तब जोड देनेसे ५९४ पाँचसौ चौरानवे हुए. इसका आधा किया तब २९७ दोसौ सत्तानवे हुए. यही वर्गमूल अर्थात् उत्तर हुआ ॥ ।-।-।-।-। ( उ०) तथा पूर्वोक्त रीतिके अनुसार १००१०००२५ का मूल १०००५ दश हजार पाँच होता है. अर्थात् अन्तके विषम अंक १ एकमें १एकका वर्ग घटाया तब शेष अङ्क कोई विषम अङ्कमें नहीं रहा. और जिसका वर्ग घटाया है उस १ को द्विगुण करके वर्गराशि मूल पंक्ति पंक्तिमें रक्खा फिर ।-।-।-।-। अन्तके विषमके १००१०००२५ १ २ समीपका सम अंक ० २)०(० ० शून्यमें पंक्ति २ २ ―― का भाग दिया तब ०० २० शून्य लब्धि हुआ ०० ० और शून्य ही शेष २०)००१(० ―― रहा. फिर विषम ०० २०० अंक ० शून्यको ००१० ० उतारा उसमें सम ०००० ―― अङ्कमें भागको लब्धि २००)००१००( ० २००० शून्यका वर्ग घटा ००००० १० दिया. तब शून्य ही ००१०००| ―― शेष रहा फिर ०००००० २००१० जिस अङ्कका वर्ग २०००)००१०००२(५ २) २००१० ( १०००५ फल घटाया था उस ००१०००० २ शून्य ० को द्विगुण ००००००२५ ―― किया; तब शून्य ही ५२ ०० रहा. उसको पंक्तिमें ०० ० ―― ००० ० ―― ०००१ ०००० ―― ०००१० ०००१० ―― ०००००