लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextव्यस्तविधिप्रकारः । (४१) प्रश्नकर्ताके कहनेके अनुसार विधि ज्ञात राशि १४ में किया तब भी तिरसठ ही आता है क्योंकि १४ चौदहको शून्यसे गुणा करनेसे यद्यपि राशि शून्य हो जाना चाहिये तथापि विधि करना अभी शेष है इस कारण राशि १४×० को चिन्तना कर लिया. फिर अपना आधा उसमें जोडा तब २१×० ऐसा रूप हुआ. फिर तीन ३ से गुणा किया तब ६३×० ऐसा रूप हुआ. फिर ० शून्य का भाग दिया तब ६३÷० पूर्वोक्त रीति के अनुसार राशि जैसा था वैसाही रहा, क्योंकि जहाँ शून्य गुणक होता है वहाँ यदि ० शून्य भाजक हो जाय तब राशिमें विकार नहीं होता है इस कारण यही ६३ दृष्ट राशि हुआ . इष्ट कर्मकी रीति से भी यही राशि प्राप्त होता है. इस शून्यपरिकर्माष्टकका ग्रहगणितमें बहुत काम पडता है ॥ इति शून्यपरिकर्माष्टकम् ॥ अथ व्यस्तविधौ करणसूत्रं वृत्तद्वयम्-- अब व्यस्तविधि करनेकी रीति दो श्लोकोंमें कहते हैं- छेदं गुणं गुणं छेदं वर्गं मूलं पदं कृतिम् ॥ ऋणं स्वं स्वमृणं कुर्याद् दृश्ये राशिप्रसिद्धये ॥ ८ ॥ अन्वयः-विलोमविधौ राशिप्रसिद्धये छेदं गुणं प्रकल्प्य गुणं छेदं प्रकल्प्य वर्गं मूलं प्रकल्प्य मूलं कृतिं प्रकल्प्य ऋणं स्वं प्रकल्प्य दृश्ये विधिं कुर्यात् ॥ ८ ॥ अर्थः-विलोमविधिमें राशि जाननेके वास्ते हरको गुण कल्पना करे और गुणको हर कल्पना करे, वर्गको मूल कल्पना करे, मूलको वर्ग कल्पना करे तथा घटाने योग्य अङ्कको जोडने योग्य अङ्क कल्पना करे और जोडने योग्य अङ्कको घटाने योग्य अङ्क कल्पना करे. फिर विधि करे तो दृष्ट राशिकी प्रसिद्धि होती है- यदि भिन्न अंकोंका विलोम करना हो तो- अथ स्वांशाधिकोने तु लवाढ्योनेो हरो हरः ॥ अंशस्त्वविकृतस्तत्र विलोमे शेषमुक्तवत् ॥ ९ ॥ अन्वयः-अथ स्वांशाधिकोने तु लवाढचोनः हरः हरः स्यात् । अंशः तु अविकृतः ज्ञयः । शेषं विलोमे उक्तवत् कार्यम् ॥ ९ ॥ अर्थः-यदि अपना अंश अधिक हीन हो तो अंशहीन होने पर अंशको लवमें जोडकर हर कल्पना करे और अंश अधिक होनेपर अंशको हरमें घटाकर शेषको हर कल्पना करे और अंश जैसाका तैसा रखे फिर शेष विधि जो विलोममें कहा है सो करे ॥ ९ ॥ अत्रोद्देशकः- विलोम विधिके विषयमें उदाहरण:- यस्त्रिघ्नस्त्रिभिरन्वितः स्वचरणैर्भक्तस्ततः सप्तभिः स्वत्र्यंशेन विवर्जितः स्वगुणितो हीनो द्विपञ्चाशता ॥