BharatKosha
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा

DevanagariSanskritpublished268 pages

Page 76 of 268

Read in context
Page 76

( ६० ) लीलावती । आधा हीन कर दे. फिर जो राशि निष्पन्न हो उसका वर्ग करनेसे वह राशि सिद्ध होती है, जो कि प्रश्नकर्ता पूंछना चाहता है ॥ १५ ॥ यदा लवैश्चोनयुतः स राशिरैकेन भागोनयुतेन भक्तवा ॥ दृश्यं तथा मूलगुणञ्च ताभ्यां साध्यस्ततः प्रोक्तवदेव राशिः १६ अन्वयः-यदा सः राशिः लवैः च ऊनयुतः तदा दृश्यं तथा मूलगुणं च भागोन युतेन एकेन भक्तवा ततः ताभ्यां प्रोक्तवत् एव राशिः साध्यः ॥ १६ ॥ अर्थः-और जो वही गुणघ्नमूलोनयुत दृष्ट राशि अपने अंशोंसे हीन वा युत हो तो दृश्य तथा मूलगुणको भी ( यदि अपने अंशों करके हीन हो तो ) अंशोंको एकमें घटाकर जो शेष रहे उसका भाग देनेसे ( और यदि अपने अंशों करके युक्त हो तो ) अंशोंको १ एकमें जोडकर उसका भाग गुण और दृश्यमें देकर गुणमें भाग देनेसे जो लब्धि हुई है उसको मूलगुण। माने और दृश्यमें भाग देनेसे जो लब्धि हुई है उसको दृष्टराशि माने. फिर ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार राशि लावे ॥ १६ ॥ यो राशिर्मूलेन केनचिद्गुणितेन ऊनो दृष्टस्तस्य गुणार्द्धकृत्या युक्तस्य दृष्टस्य यत्पदं तद्गुणार्द्धेन युक्तं कार्य्यं यदि गुण- घ्नमूलयुतो दृष्टस्तर्हि हीनं कार्य्यं तस्य वर्गो राशिः स्यात् ॥ यह ऊपरके सूत्रका फलित करके लिखा है. अभिप्राय वही है जो कि ऊपर सूत्रमें कहा है. मूलोने दृष्टे तावदुदाहरणम्- पहले मूलोन दृष्ट राशिका उदाहरण दिखाते हैं. बाले मरालकुलमूलदलानि सप्त तीरे विलासभरमन्थरगा- ण्यपश्यम् ॥ कुर्वच्च केलिकलहं कलहंसयुग्मं शेषं जले वद मरालकुलप्रमाणम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे बाले ! सप्त मरालकुलमूलदलानि तीरे मन्थरगाणि अपश्यम् । शेषं कलहंसयुग्मं च केलिकलहं कुर्वत् जले दृष्टम् । तर्हि मरालकुलप्रमाणं वद ॥ १ ॥ अर्थः-हे सोलह वर्षकी उमरवाली प्रिये ! एक हंसोंका समूह था, उसमेंसे राशिके मूलका आधा सप्त गुणित नदीके तटपर देखा और बाकी एक जोडा क्रीडा करता हुआ जलके भीतर देखा था, तो कहो वह हंसोंका समूह कितनी संख्याका था ? ॥ २ ॥