लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextगुणकर्मप्रकारः । ( ६३ ) जोडा तब १६००/४९ - ४८/७ = ११२००/३४३ - २३५२/३४३ = १३५५२/३४३ ऐसा हुआ. यहां सात ७ का परिवर्तन दिया तब १९३६/४९ ऐसा राशिका स्वरूप हुआ. इसका वर्गमूल लिया तब ४४/७ ऐसा राशि हुआ. इसमें गुणार्द्ध ४/७ को जोडा ४४/७ + ४/७ = ४८/७ तब ऐसा होनेपर अंशमें हरका भाग देकर राशिको शोधा तब १२ बारह लब्धि हुआ. इसका वर्ग किया तब १४४ एकसौ चौवालिस हुआ. यही हंसोंका समूह था. क्योंकि इसका मूल १२ दसगुणा १२० तो मानस सरोवरको चला गया. आठवा भाग १८ अठारह स्थलपद्मिनीपर चला गया और ६ छह जलमें क्रीडा कर रहा था. सब जोडा तब वही १४४ हुआ ॥ अथ भागमूलोने दृष्टे उदाहरणम्- अंशोंका मूल जिसमें ऊन हो ऐसे दृष्टराशिकै विषयका उदाहरण- पार्थः कर्णवधाय मार्गणगणं क्रुद्धो रणे सन्दधे तस्यार्द्धेन निवार्य्य तच्छरगणं मूलैश्चतुर्भिर्हयान् ॥ शल्यं षड्भिरथेषुभिस्त्रिभिरपि च्छत्रं ध्वजं कार्मुकं चिच्छेदास्य शिरः शरेण कति ते यानर्जुनः सन्दधे ॥ ४ ॥ अन्वयः-पार्थः रणे क्रुद्धः सन् कर्णवधाय मार्गणगणं सन्दधे । तस्यार्द्धेन तच्छर- गणं निवार्य्य तथा चतुर्भिः मूलैः हयान् निवार्य्य तथा षड्भिः इषुभिः शल्यं निवार्य्य अथ त्रिभिः छत्रं ध्वजं कार्मुकम् अपि चिच्छेद । शरेण अस्य शिरः चिच्छेद । तर्हि कति ते बाणाः यान् रणे अर्जुनः सन्दधे ॥ ४ ॥ अर्थः-पृथाके पुत्र अर्जुनने क्रोधमें भरकर रणमें कर्णके मारनेके वास्ते कुछ बाणोंका समूह लिया. उसमेंसे आधे बाणोंसे कर्णके बाणोंको काट डाला और उस बाणगणके चतुर्गुणित मूलसे उसके घोडोंको मार डाला और ६ छह बाणोंसे उसके सारथी शल्यको यमराजका अतिथि बनाया. फिर तीन ३ बाणोंसे छत्र ध्वजा और धनुषको तोड डाला. पीछे एक बाणसे कर्णका शिर काट डाला तो कहो उस रणमें अर्जुनने कितने बाण लिये थे ? ॥ ४ ॥ न्यासः-भागः १/२ मूलगुणः ४ दृश्यम् १० “यदा लवै श्रोनयुत” इत्यादिना जातं बाणमानम् १०० । फैलाव-यहाँ उपरोक्त नियमानुसार भाग १/२ को एक १ में घटाया १/१ - १/२ = २/२ - १/२ = १/२ तब ऐसा होनेपर इसका गुण ४ चारमें भाग लिया तब ४/१ / १/२ = ४/१ / १/२ = ८/१ यही हुआ और इसी १/२ का दृश्य १० में भाग लिया तब १०/१ / १/२ = २/१ × १०/१ = २०/१ ऐसा होनेपर इस ८ राशिका मूलगुण माना और इस