लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in contextगुणकर्मप्रकारः । ( ६५ ) फैलाव-इस उदाहरणमें भाग ८/९ को १ एकमेंसे हीन किया तो ८/९ १/१ = ८/९ - ९/९ = १/९ यह हुआ. इसका गुण १/२ में भाग लिया तब १/२ १/९ = ९/१ १/२ = ९/२ ९/२ यह मूलगुण हुआ और दृश्य १ एकमें १/९ काभाग लिया तब १/१ १/९ = ९/१ १/१ = ९/१ = ९ ऐसा दृश्य हुआ. गुण ९/२ के आधे ९/४ का वर्ग ८१/१६ दृश्य ९ नौमें समच्छेद करके जोडा तब ८१/१६ + ९/१ = ८१/१६ + १४४/१६ = २२५/१६ ऐसा अङ्क हुआ. इसका मूल लिया तब १५/४ मिले. इसमें गुणका आधा ९/४ जोडा तब १५/४ + ९/४ यहां समच्छेद है इस लिये ऐसा रूप २४/४ हुआ. यहां अंशमें हरका भाग देकर राशिको शोधा तब ६ छ लब्धि हुए इसका. वर्ग किया तब ३६ छत्तीस हुए यह आधी राशि हुई. इसे दूना किया तब सम्पूर्ण राशि ७२ बहत्तर हुआ. यही भ्रमरों की संख्या है. क्योंकि राशि ७२ के आधे ३६ का मूल छ भ्रमर मालतीपर जा बैठे और सम्पूर्ण राशि ७२ का नौमा भाग ८ आठ गुणा ६४ चौसठ भ्रमर भी मालतीपर ही जा बैठे २ भ्रमर कमलपर रहे. सब जोडा तब ७२ बहत्तर ही हुए. भागमूलयुते दृष्टे उदाहरणम्- अंश और मूलकरके युक्त दृष्टके विषयका उदाहरण- यो राशिरष्टादशभिः स्वमूलै राशित्रिभागेन समन्वितश्च ॥ जातं शतद्वादशकं तमाशु जानीहि पाट्यां पटुतास्ति ते चेत् ॥ अन्वयः-यः राशिः अष्टादशभिः स्वमूलैः राशित्रिभागेन च समन्वितः शतद्वाद- शकं जातम् । तं चेत् ते पाट्यां पटुता अस्ति तर्हि आशु जानीहि ॥ ६ ॥ अर्थः-जो राशि अपने अठारहं गुणे मूलसे और अपने तीसरे भागसे जुडा हुआ १२०० बारहसौ होता है यदि पाटीगणितमें चातुर्य रखते हो तो कहो वह राशि कौन है ? ॥ ६ ॥ न्यासः--मूलगुणकः १८ भागः १/३ दृश्यम् १२०० अत्रैकेन भागयुतेन १/३ मूलगुणं दृश्यञ्च भक्त्वा प्राग्व- ज्जातो राशिः ५७६ ॥ इति गुणकर्म ॥ फैलाव-इस उदाहरणमें १/३ भाग युक्त है इस कारण १/३ इसका एक १ में समच्छेद करके जोडा तब १/३ + १/१ = १/३ + ३/३ = ४/३ ऐसा अङ्क हुआ. फिर इस ४/३ का गुणा १८ में भाग लिया तब ४/३ १८/१ = ३/४ १८/१ = ५४/४ ऐसे होनेपर २ दोका अपवर्तन देनेसे २७/२ ऐसा रूप हुआ. दृश्य १२०० में ४/३ का भाग दिया तब ४/३ १२००/१ = ३/४ १२००/१ = ३६००/४ ऐसा होनेपर ४ चारका अपवर्तन ५