लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( ७२ ) लीलावती । अर्थः-पञ्चराशिक, सप्तराशिक, नवराशिक इत्यादिमें फल और हर इनका पलटा करके अर्थात् इस पक्षके उस पक्षमें लिखकर जिधर बहुत राशि हों उधर के राशियोंके घातमें थोडी राशियोंके घातका भाग दे तब जो लब्धि हो वही फल होता है ॥ १९ ॥ उदाहरणम्- मासे शतस्य यदि पञ्च कलान्तरं स्याद्वर्षे गते भवति किं वद षोडशानाम् ॥ कालं तथा कथय मूलकलान्तराभ्यां मूलं धनं गणक कालफले विदित्वा ॥ १ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यदि मासे शतस्य कलान्तरं पञ्च स्यात् तर्हि वर्षे गते षोडशानां किं भवति इति त्वं वद ! तथा मूलान्तराभ्यां कालं कथय । तथा काल- फले विदित्वा मूलं धनं कथय ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! यदि एक महीनेमें सौ निष्कका व्याज ५ पाँच निष्क- होता है तो एक १ वर्षमें सोलह १६ निष्कका क्या होगा ? यह तुम कहो और मूल व्याज जानकर काल कहो अर्थात् एक १ महीनेमें यदि सौ १०० निष्कका ५ पाँच निष्क व्याज मिलता है तो ४८/५ अडतालीसके नीचे पाँच हर कितने दिनोंमें मिलेगा ? तथा काल और व्याज जानकर मूलधन कहो, अर्थात् यदि एक महीनेमें सौ १०० निष्कका पांच निष्क व्याज मिलता है तो एक वर्षमें अडतालीसका पञ्चमांस ४८/५ कितने मूलधनपर मिलेगा सो कहो ? ॥ १ ॥ न्यासः-- १ | १२ अन्योन्यपक्षनयने न्यासः-- १ | १२ १०० | १६ | १६ ५ | | ५ बहूनां राशीनां वधः ९६० अल्पराशिवधः १०० अनेन भक्ते लब्धम् ९ शेषम् ६०/१०० विंशत्यापवर्त्य ३/५ जातं कलान्तरम् ९ ३/५ छेदघ्नरूपेष्विति कृते जातम् ४८/५ फैलाव-यहां ५ पांच राशि हैं, इस कारण यह पञ्चराशिकका स्थल है. यहां साधारण न्यास ऐसा है कि यदि एक महिनेमें १०० के पाँच यह पूर्वपक्ष हैं