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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा

DevanagariSanskritpublished268 pages

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सप्तराशिकप्रकारः । ( ७७ ) अर्थः-हे वैश्यवर्य्य ! जो तुम व्यापार करना जानते हो तो यदि तीन ३ हाथ चौंडी और ८ आठ हाथ लम्बी और विचित्ररूपकी सुंदर रेशमकी ८ आठ दुपटी सौ १०० निष्ककी मिलती हैं तो साढे तीन ३ १/२ हाथ लम्बी और आधा १/२ हाथ चौंडी वैसी ही सुंदर रेशमकी दुपटी दूसरी कितनेकी आवेगी सो शीघ्र कहो ॥१३॥ न्यासः- | १/२ लब्धो निष्कः ० द्रम्माः १४ ३ ८ | ७/२ पणाः ९ काकिणी १ ८ १०० | १ वराटकाः ६ २/३ फैलाव-यहां प्रश्न करनेवालेके कहनेके अनुसार न्यास- ३/८/८/१०० | १/२/३ १/२/१ यह हुआ ३/८/८/१०० | १/२/७/२/१ यह न्यास हुआ. फिर यहां भागानुबन्ध किया तब फल और हरोंका पलट किया तब ३/८/८ | १/२/१००/१ ऐसा रूप हुआ. यहां बहुत राशिका घात ७०० सातसौमें थोडी राशिके घात ७६८ सातसौ अडसठ भाग दिया सो भाज्यके अल्प होनेसे लग नहीं सकता, इस कारण भाज्य ७०० निष्कके “द्रम्मैस्तथा षोडशभिश्च निष्कः” १६ सोलहसे गुणा करके द्रम्म बनाये तो ११२०० ग्यारहसहस्र दोसौ हुए, इसमें अल्पराशि घातका भाग किया तब १४ चौदह द्रम्म लब्धि हुए. और ४४८ चारसौ अडतालीस शेष बचे इनके “ते षोडश द्रम्म इहावगम्यः” १६ सोलहसे गुणा करके पण बनाये तो ७१६८ सात हजार एकसौ अडसठ हुए. इसमें अल्पराशिघात ७६८ का भाग दिया तब ९ नौ पण लब्धि हुए और २५६ दोसौ छप्पन बचे. इनकी “ताश्च पणश्चतस्रः” चार ४ से गुणा करके काकिणी बनाई तो १०२४ एक हजार चौबीस हुई, इनमें अल्पराशि घातका भाग दिया तब १ एक काकिणी लब्धि हुई और २५६ दोसौ छप्पन बचीं. इनके "वराटकानां दशकद्वयं यत्सा काकिणी ” बीस २० से गुणा करके वराटक बनाये तो ५१२० पांच हजार एकसौ बीस हुए, इनमें अल्पराशिघातका भाग दिया तब ६ छ वराटक लब्धि हुए और ५१२/७६८ यह भिन्नाङ्क बचा, इसमें २५६ दोसौ छप्पन का परिवर्तन दिया तब २/३ यह भिन्नांक बचा रहा. इस प्रकार उस एक दुपटीका मोल द्रम्म १४ पण ९ काकिणी १ वराटक ६ २/३ हुए. CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri